Class 12th Chapter 9 उपसहसंयोजी रसायन PART 1
प्रश्न - उपसहसंयोजी रसायन किसे कहते हैं ?
उत्तर - उपसहसंयोजी रसायन - अकार्बनिक रसायन की वह शाखा जिसके अंतर्गत उपसहसंयोजजी यौगिकों का अध्ययन किया जाता है , उपसहसंयोजी रसायन कहलाता है ।
उपसहसंयोजी यौगिक धातुओं के निष्कर्षण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदर्शित करते हैं ।
प्रश्न - आणविक या योगात्मक योगिक किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - आणविक या योगात्मक यौगिक - जब दो अथवा अधिक सामान्य लवण को एक निश्चित अनुपात में जल में मिलाकर पुनः क्रिस्टलन किया जाता है , तब एक नए यौगिक के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं । इन क्रिस्टलीय यौगिकों को योगात्मक यौगिक कहते हैं । इन क्रिस्टलीय यौगिकों की संरचना सामान्य लवण से भिन्न होती है ।
जैसे -
K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 24H2O -------> K2SO4 . Cr2(SO4)3 . 24H2O { क्रोम एलम }
योगात्मक यौगिक के प्रकार - योगात्मक यौगिक 2 प्रकार के होते हैं -
1. द्विक लवण ( Double salt )
2. संकुल लवण या उपसहसंयोजी यौगिक ( Complex Salt )
1. द्विक लवण ( Double salt ) - ऐसे योगात्मक लवण जो जल में घोले जाने पर अपने सभी अवयवी घटकों में विभक्त हो जाते हैं , द्विक लवण कहलाते हैं । इनके जलीय विलयन में सभी घटक आयनों का परीक्षण किया जा सकता है ।
2. संकुल लवण या उपसहसंयोजी यौगिक - ऐसे योगात्मक लवण जो जल में घोले जाने पर अपने सभी अवयवी घटकों में विभक्त नही होते हैं , संकुल लवण कहलाते हैं । इनके जलीय विलयन में सभी घटक आयनों का परीक्षण किया जा सकता है ।

इस यौगिक के जलीय विलयन में ना कॉपर आयन का और ना अमोनिया का परीक्षण किया जा सकता है । ऐसे योगात्मक यौगिकों को उपसहसंयोजक यौगिक भी कहते हैं ।
प्रश्न - द्विक लवण और संकुल लवण में अंतर लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - निम्न को परिभाषित कीजिए -
1. समन्वयन मंडल ( Co-ordination sphere )
2. केंद्रीय आयन ( Central ion )
3. संलग्नी या लीगेंड ( Legand )
4. संकुल ( Complex )
5. समन्वयन संख्या ( Co-ordination number )
1. समन्वयन मंडल ( Co-ordination sphere ) - केंद्रीय धातु आयन तथा उससे जुड़े हुए लिगेंड को एक बड़े कोष्टक [ ] के रूप में लिखते हैं , इसे उपसहसंयोजक मंडल कहते हैं । यह संपूर्ण भाग एक आयन होता है ।
जैसे -
2. केंद्रीय आयन ( Central ion ) - धनायन अथवा परमाणु जो एक या अधिक उदासीन अणुओं अथवा आयनों से समन्वयित होता है , इसे हम केंद्रीय आयन कहते हैं ।
जैसे -
3. संलग्नी या लीगेंड ( Legand ) - परमाणु , अणु या आयन जो केंद्रीय धातु आयन से जुड़ा होता है , लीगेण्ड या संलग्नी कहलाता है । लिगेंड के संयोजी कक्षक में इलेक्ट्रॉनों का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होना आवश्यक है , जो केंद्रीय धातु आयन को देता है ।
जैसे - Cl- , Br- , I- , CN- , OH- , NO2 , CO आदि ।
4. संकुल ( Complex ) - यह एक विद्युत आवेशित आयन होता है जिसमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन होता है जो उदासीन अणुओं या विपरीत आवेशित आयनो से उपसहसंयोजी बंधों के द्वारा जुड़ा रहता है , संकुल आयन युक्त योगिक को संकुल यौगिक कहते हैं ।
संकुल के प्रकार - संकुल निम्न तीन प्रकार के होते हैं -
1. धनायनिक संकुल
2. ऋणायनिक संकुल -
3. उदासीन संकुल -
5. समन्वयन संख्या ( Co-ordination number ) - किसी संकुल आयन में केंद्रीय धातु आयन से जुड़े हुए लिगेंडों की संख्या को उपसहसंयोजक संख्या या समन्वयन संख्या कहते हैं । धातु आयन प्रायः 2 , 3 , 4 और 6 समन्वयन संख्या संख्या प्रदर्शित करते हैं ।
जैसे -
प्रश्न - लीगेंड को एकदंतुर , द्विदंतुर और बहुदंतुर के रूप में किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है ?
उत्तर - अणु में उपस्थित दाता परमाणुओं की संख्या के आधार पर लिगेंडों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है -
1. एकदंतुर लिगेंड - वे लिगेंड जिनमें केवल एक दाता परमाणु होता है , एकदंतुर लिगेंड कहलाता है । यह केंद्रीय धातु आयन के साथ केवल एक बंध बनाते हैं ।
जैसे -
2. द्विदंतुर लिगेंड - वे लिगेंड जिनमें दो दाता परमाणु होते है , द्विदंतुर लिगेंड कहलाता है । यह केंद्रीय धातु आयन के साथ दो बंध बनाते हैं ।
जैसे -

3. बहुदंतुर लिगेंड - वे लिगेंड जिनमें दो से अधिक दाता परमाणु होते है , बहुदंतुर लिगेंड कहलाता है । यह केंद्रीय धातु आयन के साथ दो से अधिक बंध बनाते हैं ।
जैसे - निकिल डाइमेथिल ग्लाइआक्सिम [ Ni(DMG) ]

प्रश्न - कीलेट और कीलेटीकारक लिगेंड से आप क्या समझते हो ?
अथवा
कीलेट का महत्व एवं उदाहरण समझाइए ।
उत्तर - कीलेट ( Chelates ) - जब कोई द्विदंतुर लिगेंड या बहुदन्तुर लिगेंड अपने दो या दो से अधिक दाता परमाणु के द्वारा एक ही केंद्रीय धातु आयन से जुड़ता है और चक्रीय संरचना वाला अणु बनाता है तो इस यौगिक को कीलेट कहते हैं और इस प्रकार के लीगेंड को कीलेटीकारक कहते हैं ।
जैसे - निकिल डाइ मेथिल ग्लाइऑक्सिम

कीलेट का महत्त्व -
1. कीलेट धातु Mg , Ni , Cu आदि के आंकलन में ।
2. जैव प्रक्रियाओं व जलशोधन में ।
3. आंतरिक संक्रमण तत्वों के पृथक्करण में ।
4. गुणात्मक विश्लेषण में कुछ धातु आयनों की पहचान में ।
5. कठोर जल के मृदुकरण में ।
प्रश्न - उभयधर्मी लिगेंड एवं सेतु लिगेंड से आप क्या समझते हो ? उदहारण सहित लिखिए ।
उत्तर - उभयधर्मी लिगेंड - ऐसे लिगेंड जिनमें दो या दो से अधिक दाता परमाणु उपस्थित होते हैं परंतु इनमें से केवल एक ही धनायन से जुड़ा होता है , ऐसे लिगेंडों को उभयधर्मी लिगेंड या एम्बिडेंटेट लिगेंड कहते हैं ।
जैसे -

सेतु लिगेंड (Bridging ligands )- सेतु लिगेंड वे लीगेण्ड होते हैं जो एक से अधिक धातु आयनों को साथ-साथ बांधे रखते हैं । OH- , Cl- , NH2- आदि एकदंतुर व सेतु लीगेण्ड
दोनों का कार्य करते हैं ।
प्रश्न - होमोलेप्टिक एवं हेटरोलेप्टिक संकुल किसे कहते हैं ? समझाइये ।
उत्तर - होमोलेप्टिक संकुल - ऐसे संकुल जिनमें धातु आयन केवल एक प्रकार के लिगेंडों से बंधे होते हैं , होमोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं ।
जैसे -

हेटरोलेप्टिक संकुल - ऐसे संकुल जिनमें धातु आयन एक से अधिक प्रकार के लिगेंडों से बंधे होते हैं , हेटरोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं ।
जैसे -

प्रश्न - समावयवता किसे कहते हैं ? समावयवता कितने प्रकारों में बांटा गया है ?
उत्तर - समावयवता - वे यौगिक जिनके आणविक सूत्र समान होते हैं किंतु संरचना में भिन्नता के कारण भौतिक और रासायनिक गुण भिन्न होते हैं , समावयवी कहलाते हैं और इस घटना को समावयवता कहते हैं ।
समावयवता के प्रकार - समावयवता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है -
1. संरचनात्मक समावयवता
2. त्रिविम समावयवता
1. संरचनात्मक समावयवता - केंद्रीय धातु परमाणु के चारों ओर लिगेंड की जमावट की भिन्नता के कारण उत्पन्न समावयवता को संरचनात्मक समावयवता कहते हैं ।
संरचनात्मक समावयवता निम्न प्रकार की होती है -
१.आयनन समावयवता
२. हाइड्रेट समावयवता
३. बंधनी समावयवता
४. उपसहसंयोजन समावयवता
2. त्रिविम समावयवता - जब समावयवी के रासायनिक सूत्र व रासायनिक बंध समान होते हैं , किंतु उनकी द्विक स्थान व्यवस्थाएं भिन्न होते हैं । तब इसे त्रिविम समावयवता कहते हैं ।
यह यौगिक दो प्रकार की त्रिविम समावयवता प्रदर्शित करते हैं -
1. ज्यामितीय समावयवता
2. प्रकाशीय समावयवता
प्रश्न - निम्न को परिभाषित कीजिए -
१.आयनन समावयवता
२. हाइड्रेट समावयवता
३. बंधनी समावयवता
४. उपसहसंयोजन समावयवता
५. ज्यामितीय समावयवता
६. प्रकाशीय समावयवता
१.आयनन समावयवता - ऐसे यौगिक जिनका मूलानुपाती सूत्र एक ही होता है किंतु जो बिलयन में आयनन के पश्चात भिन्न-भिन्न आयन देते हैं , आयनन समावयवी कहलाते हैं तथा यह समावयवता आयनन समावयवता कहलाती है । यह समावयवता उपसहसंयोजी मंडल के अंदर तथा बाहर के लिगेंड के विनिमय के कारण उत्पन्न होती है ।
जैसे -
२. हाइड्रेट समावयवता - जब किसी संकुल के उपसहसंयोजक मंडल के भीतर और बाहर जल के अणु की संख्या में भिन्नता होती है । तब हाइड्रेट समावयवता उत्पन्न होती है ।
जैसे -

३. बंधनी समावयवता - जब केंद्रीय धातु आयन से एक ही लिगेंड अन्य परमाणु द्वारा जुड़ता है तो प्राप्त संरचना भिन्न होती है , जो एक दूसरे के समावयवी होते हैं । इस घटना को बंधन समावयवता कहते हैं । इस प्रकार के लिगेंड को उभयधर्मी लिगेंड कहते हैं ।
जैसे -
४. उपसहसंयोजन समावयवता - यह समावयवता तब उत्पन्न होती है जब धनायन और ऋण आयन दोनों संकुल होते हैं तथा एक ही धातु परमाणु भिन्न लिगेंडों से संयुक्त रहता है ।
जैसे -

५. ज्यामितीय समावयवता - इसे सिस - ट्रांस समावयवता भी कहते हैं । जब केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर दो समान लिगेंड एक दूसरे के निकटवर्ती अर्थात 90° पर होते हैं तो उसे सिस समावयवी एवं जब एक दूसरे के विपरीत अर्थात 180° पर रहते हैं तो उन्हें ट्रांस समावयवी कहते हैं ।
4 व 6 उपसहसंयोजन संख्या वाले संकुल , ज्यामितीय समावयवता दर्शाने वाले सामान्य उदाहरण है ।

६. प्रकाशीय समावयवता - जब त्रिविम समावयवी एक दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हुए एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं होते हैं । तब इस प्रकार की समावयवता को प्रकाशीय समावयवता कहते हैं । इन समावयवी को प्रतिबिम्ब रूप कहते हैं ।
अणु या आयन जो एक दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते किरेल कहलाते हैं । यह दो रूप दक्षिण ध्रुवण घूर्णक और बामां ध्रुवण घूर्णक कहलाते हैं । d समावयवी समतल ध्रुवित प्रकाश को दाएं तरफ और l - समावेशी समतल ध्रुवित प्रकाश को बाईं तरफ घुमा देता है । इस प्रकार की समावयवता सामान्य रूप से द्विदंतुर लिगेंड युक्त अष्टफलकीय संकुल में पाई जाती है ।
जैसे - [ PtCl2 (en)2 ]2+
प्रश्न - कार्बधात्विक यौगिक किसे कहते हैं ? कार्ब धात्विक यौगिकों के अनुप्रयोग लिखिए ।
उत्तर - कार्बधात्विक यौगिक - ऐसे यौगिक जिनमें कार्बनिक समूह का कार्बन परमाणु सीधे धातु परमाणु से जुड़ा होता है कार्यधात्विक यौगिक कहलाते हैं । इन यौगिकों में कार्बन परमाणु अपने से कम ऋणविधुती अथवा अधिक धनविद्युती तत्वों के परमाणु से जुड़ा रहता है ।
जैसे -
टेट्रा एथिल लेड (C2H5)4Pb
डाइ एथिल जिंक (C2H5)2Zn
एथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड C2H5-Mg-Br
टेट्रा मिथाइल सिलेन (CH3)4Si
कार्ब धात्विक यौगिकों का वर्गीकरण - कार्बधात्विक यौगिकों का वर्गीकरण धातु एवं कार्बन के बीच बंध के प्रकार एवं प्रकृति के आधार पर निम्न प्रकार के होते है -
1. आयनिक - C2H5-Na
1. सिग्मा संकुल - ex . डाइ ऐथिल जिंक , टेट्रा एथिल जिंक
2. पाई संकुल - ex. फेरोसीन , डाइ बेंजीन क्रोमियम आदि ।
3. धातु कार्बोनिल - ex. [ Fe (CO)5 ]
कार्ब धात्विक यौगिकों के अनुप्रयोग -
1. टेट्रा एथिल लेड का उपयोग अपस्फोटनरोधी यौगिक के रूप में किया जाता है ।
2. जिगलर नाटा उत्प्रेरक का उपयोग एथिलीन व अन्य एल्कीन की बहुलीकरण क्रिया में किया जाता है ।
3. एथिल मरक्यूरिक क्लोराइड का उपयोग कृषि में कीटनाशक के रूप में किया जाता है ।
4. विलकंसन उत्प्रेरक का उपयोग कुछ एल्कीनों हाइड्रोजनीकरण में किया जाता है ।
5. सिलिकॉन का उपयोग स्टॉपकॉर्क ग्रीस के रूप में , सिलिकॉन क्रीम का उपयोग हाथों को दाहक पदार्थों से बचाने में किया जाता है ।
6. बैक्टीरियानाशी , फंगसनाशी तथा कीटाणुनाशक के रूप में कार्बधात्विक यौगिक प्रयोग में लाए जाते हैं ।
प्रश्न - उपसहसंयोजी यौगिकों के उपयोग लिखिए ।
उत्तर - उपसहसंयोजी यौगिकों के उपयोग निम्न है -
1. सिल्वर तथा गोल्ड के निष्कर्षण में
2. धातु शुद्धिकरण में
3. फोटोग्राफी में
4. विद्युत लेपन में
5. जल की कठोरता के निर्धारण में
प्रश्न - निम्न पर टिप्पणी लिखिए -
A. धातु कार्बोनिल
B. प्रभावकारी परमाणु संख्या (EAN)
उत्तर - A. धातु कार्बोनिल - ऐसी कार्बधात्विक यौगिक जिनमें संक्रमण धातु के साथ कार्बोनिल समूह लिगेंड का कार्य करता है , धातु कार्बोनिल कहलाते हैं । इनके M-C बंध में सिग्मा तथा पाई दोनों के लक्षण हो सकते हैं ।
एमोंड ने सबसे पहले निकिल कार्बोनिल तथा आयरन पेंटाकार्बोनिल यौगिक का निर्माण किया । इनके अलावा आजकल क्रोमियम , मॉलिब्डेनम , टंगस्टन आदि धातुओं के भी कार्बनिक योगिक बनाए गए हैं।
B. प्रभावकारी परमाणु संख्या (EAN) - उपसहसंयोजी यौगिक में केंद्रीय धातु आयन में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा उपसहसंयोजी बंध बनने के बाद धातु आयन द्वारा लीगेंड से प्राप्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या के योग को प्रभाव कारी परमाणु संख्या या EAN कहते हैं।
जैसे -K4 [ Fe (CN)6 ] में Fe की परमाणु संख्या 26 है , आयन बनने में त्यागे इलेक्ट्रॉन 2 तथा बंध बनने से प्राप्त इलेक्ट्रॉन 12 हैं ।
अतः प्रभावी परमाणु संख्या ( EAN ) = 26-2+12 = 36
प्रश्न - प्राथमिक एवं द्वितीयक संयोजकता में अंतर लिखिए ।
उत्तर - 1. प्राथमिक संयोजकता आदिशात्मक होती है , जबकि द्वितीय संयोजकता दिशात्मक होती है ।
2. प्राथमिक संयोजकता आयनित होती है , जबकि द्वितीय संयोजकता आयनित नहीं हो सकती है ।
3. प्राथमिक संयोजकता को पूर्ण (ठोस) रेखा( _ ) से प्रदर्शित करते हैं , जबकि द्वितीयक संयोजकता को बिंदुकित या टूटी रेखा (.....) से प्रदर्शित करते हैं ।
उदाहरण - [ Co (NH3)6 ]Cl3 में प्राथमिक संयोजकता 3 है तथा द्वितीयक संयोजकता 6 है ।
प्रश्न - जाईसे लवण एवं फेरोसीन से आप क्या समझते हो ।
उत्तर - जाईसे लवण (Zeise salt ) - पोटेशियम एथीलीन ट्राइक्लोरो प्लेटिनम को जाइसे लवण कहते हैं । इस यौगिक की खोज डेनमार्क के फार्मेसिस्ट जायसे ने सन 1830 में की थी । यह संक्रमण धातुओं के प्रथम प्राप्त यौगिक में से एक है । इसमें एथिलीन अणु का तल तथा C=C केंद्रीय परमाणु के प्रत्याशित बंध दिशा के लंबवत होता है ।
इसका सूत्र K [ PtCl3 ( n2- C2H4 ] होता है ।
बनाने की विधि - पोटेशियम टेट्राक्लोरो प्लेटिनेट पर एथीलीन गैस प्रवाहित करके तैयार किया जाता है ।
फेरोसीन ( Ferrocene ) - इस यौगिक की खोज सन 1951 में कीली और पाउसन तथा मिलर एवं उनके सहयोगियों ने की । यह नारंगी - पीले रंग का यौगिक होता है । इसकी संरचना सैंडविच जैसी होती है । जिसमें दो साइक्लोपेंटाडाइनिल रिंग के बीच आयरन परमाणु होता है । इसका सूत्र Fe ( n5 - C5H5)2 होता है ।
बनाने की विधि - फेरस क्लोराइड को साइक्लोपेंटाडाइनिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड के साथ अभिक्रिया कराके फेरोसीन तैयार किया जाता है ।
C5H5MgBr + FeCl2 -----> (C5H5)2Fe + 2MgBrCl
चित्र -

प्रश्न - संकुल के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के नाम लिखिए ।
उत्तर - संकुल के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के नाम निम्न हैं -
1. धातु आयन की प्रकृति - उच्च आवेश एवं छोटे आकार वाले धातु आयन स्थाई संकुल बनाते हैं ।
2. लिगेंड की प्रकृति - लिगेंड का छोटा आकार एवं उच्च आवेश होने पर संकुल अधिक स्थाई बनता है ।
3. विलायक या माध्यम की प्रकृति - ऐसे विलायक जिनका द्विध्रुव आघूर्ण कम होता है उसमें धातु व लिगेंड की अभिक्रिया कराने पर संकुलों का स्थायित्व बढ़ता है ।
प्रश्न - निम्न चक्रण संकुल एवं उच्च चक्रण संकुल से आप क्या समझते हो ?
उत्तर - निम्न चक्रण संकुल - जब आंतरिक d - कक्षक , d2sp3 संकरण एवं बंध निर्माण में भाग लेते हैं , तो इस प्रकार के संकुलों को आंतरिक कक्षक संकुल या निम्न चक्रण संकुल कहते हैं ।
इसमें धातु आयन के इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर संकुल को प्रतिचुंबकीय बना देते हैं । इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन कम संख्या में पाए जाते हैं , अतः निम्न चक्रण संकुल कहते हैं ।
जैसे -
[ Cr(NH3)6 ]3+ , [ Fe(CN)6 ]4- , [ Co(NH)6 ]3+ आदि ।
उच्च चक्रण संकुल - जब बाह्य d - कक्षक , sp3d2 संकरण एवं बंध निर्माण में भाग लेते हैं , तो इस प्रकार के संकुलों को बाह्य कक्षक संकुल या उच्च चक्रण संकुल कहते हैं । इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक संख्या में पाए जाते हैं इसलिए यह अनुचुम्बकीय प्रकृति के होते हैं ।
जैसे -
[ CrF6 ]3- , [ Ni(NH3)6 ]2+ , [ MnF6 ]3- आदि ।
प्रश्न - उपसहसंयोजक यौगिकों में बंधन की प्रवृत्ति को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न सिद्धांतों के नाम लिखिए ।
उत्तर -
1. संयोजकता बंध सिद्धांत ( Valence Bond Theory - VBT )
2. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत ( Crystal Field Theory - CFT )
3. लिगेंड क्षेत्र सिद्धांत ( Ligand Field Theory - LFT )
4. अणु कक्षक सिद्धांत ( Molecular Orbital Theory - MOT )
प्रश्न - उपसहसंयोजन यौगिकों के नामकरण की IUPAC पद्धति का वर्णन संक्षेप में उदाहरण सहित कीजिए ।
उत्तर -
1. यदि उपसहसंयोजक यौगिक आयनिक संकुल है तो धनायन का नाम पहले और ऋणायन का नाम बाद में लिखा जाता है । संकुल भाग को एक ही शब्द के रूप में लिखते हैं जैसे - K4 [ Fe(CN)6 ] में पहले धनायन K+ का नाम और फिर ऋणायन [ Fe(CN)6 ]4- का नाम लिखते हैं -
पोटेशियम हेक्सासायनो फेरेट ( )
2. अणु के संकुल भाग का नामकरण करने के लिए पहले लिगेंड की संख्या , फिर लिगेंड का नाम (अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में ) और फिर केंद्रीय धातु आयन का नाम लिखते हैं ।
जैसे -[ Fe(CN)6 ]4- में पहले हेक्सासायनों और फिर फेरेट ( ) लिखते हैं ।
3. यदि संकुल धनायन या उदासीन अणु है तो उसके नाम का समापन किसी विशेष अनुलग्न पर नहीं होता है तथा धातु का नाम वही लिखते हैं जो तत्वों का नाम होता है ।
किंतु ऋणायनिक संकुल में केंद्रीय धातु परमाणु के नाम में अनुलग्न एट (ate) जोड़ देते हैं । ऐसे संकुलों में धातु के प्रायः लैटिन नाम प्रयुक्त किए जाते हैं ।
जैसे -
कॉपर(Cu) के लिए क्यूप्रेट
आयरन(Fe) के लिए फेरेट
सिल्वर(Ag) के लिए अर्जेंटेट
प्लेटिनम(Pt) के लिए प्लेटिनेट
मर्करी(Hg) के लिए मरक्यूरेट
क्रोमियम(Cr) के लिए क्रोमेट
कोबाल्ट(Co) के लिए कोबाल्टेट
जैसे -
[ Fe(CN)6 ]3- हेक्सासायनो फेरेट ( )
[ Fe(CN)6 ]3+ हेक्साएमीन आयरन ( )
4. संकुल के नाम के अंत में छोटे कोष्टक में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था को रोमन अंक में लिखा जाता है ।
5. ऋणात्मक लिगेंडों के नाम के अंत में ओ (O) और धनात्मक लिगेंडों के नाम के अंत में ईयम (ium) प्रत्यय लगाते हैं ।
नोट - सन 2004 में आईयूपीएसी द्वारा की गई अनुशंसा के अनुसार ऋणावेशित लिगेंडों के नाम के अंत में ' इडो (ido) ' जुडता है । उदासीन लिगेंडों के नाम अपरिवर्तित रहते हैं ।
6. लिगेंडों के नाम अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में दिए जाते हैं ।
7. प्रत्येक प्रकार के लिगेंडों की संख्या को उपसर्ग डाइ , ट्राइ आदि नाम लेकर व्यक्त करते हैं । यदि लिगेंड जटिल है , जैसे एथिलीन डाइएमीन(en) , एथिलीन डाइएमीन टेट्राएसीटेट(EDTA) आदि और दो - तीन या चार बार दोहराया जाता है तब लिगेंड के नाम लघु कोष्टक (छोटे कोष्टक) में रखकर उससे पूर्व विस , ट्रिस आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।
जैसे - [ CoCl2(en)2 ]SO4 को डाइक्लोरो बिस(एथिलीन डाइएमीन) कोबाल्ट ( ) सल्फेट कहते हैं ।
8. सेतू लिगेंड को इसके नाम से पहले ग्रीक शब्द म्यू से निर्दिष्ट करते हैं ।

प्रश्न -
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें