CLASS 12TH CHAPTER 1 SOLID STATE
प्रश्न - ठोस किसे कहते हैं ? ठोसों का वर्गीकरण कीजिए ।
उत्तर - ठोस(Solid) - पदार्थ की वह अवस्था जिसमें उसका आकार एवं आयतन निश्चित होता है , ठोस कहलाता है ।
ठोस को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
A. क्रिस्टलीय ठोस
B. अक्रिस्टलीय ठोस
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस किसे कहते हैं ? क्रिस्टलीय ठोस की विशेषताएं लिखिए ।
उत्तर - क्रिस्टलीय ठोस(Crystalline Solid) - ऐसे ठोस जिनमें अवयवी कण एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित रहते हैं तथा जिनकी एक निश्चित ज्यामिति होती है , क्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं ।
जैसे - NaCl , CsCl , KCl , हीरा , ग्रेफाइट , ठोस CO2 , आदि ।
क्रिस्टलीय ठोस की विशेषताएं -
1. इनकी एक निश्चित ज्यामिति होती है ।
2. इनमें अवयवी कण एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते हैं ।
3. यह विषमदैशिक होते हैं ।
4. यह वास्तविक अर्थों में ठोस होते हैं ।
5. इनके गलनांक एवं क्वथनांक उच्च होते हैं ।
6. इनके अवयवी कणों के मध्य प्रबल आकर्षण होता है ।
7. यह दृढ़ व असंपीडय होते है ।
8. यह गलित अवस्था में विद्युत के सुचालक व ठोस अवस्था में कुचालक होते हैं ।
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस को कितने प्रकारों में बांटा गया है ? प्रत्येक को उदाहरण देकर समझाइए ।
अथवा
अंतर कण बल के आधार पर क्रिस्टलीय ठोसों के वर्गीकरण की रूपरेखा दीजिए ।
उत्तर - क्रिस्टलीय ठोस के प्रकार क्रिस्टलीय ठोसों को उनके अवयवी कणों के बीच उपस्थित बंधों के आधार पर निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
1. आयनिक क्रिस्टल
2. आणविक क्रिस्टल
3. सहसंयोजी क्रिस्टल
4. धात्विक क्रिस्टल
1. आयनिक क्रिस्टल - ऐसे क्रिस्टलीय ठोस जिनमें अवयवी कणों के रूप में आयन रहते हैं और जो परस्पर आयनिक बंध द्वारा नियमित क्रम में जुड़े रहते हैं , आयनिक क्रिस्टल या आयनिक ठोस कहलाते हैं ।
जैसे - NaCl , KCl , CsCl , ZnS आदि ।
2. आणविक क्रिस्टल - ऐसे क्रिस्टलीय ठोस जिनमें अवयवी कणों के रूप में अणु रहते हैं और जो परस्पर वांडर वाल्स बंध या हाइड्रोजन बंध द्वारा नियमित क्रम में जुड़े रहते हैं , आण्विक क्रिस्टल कहलाते हैं ।
जैसे - ठोस CO2 (शुष्क बर्फ) , ठोस अमोनिया , कपूर , ठोस मेथेन , आयोडीन , आर्गन , ठोस HCl , SO2 , CHCl3 ,HF आदि ।
3. सहसंयोजी क्रिस्टल - ऐसे क्रिस्टलीय ठोस जिनमें अवयवी कणों के रूप में परमाणु रहते हैं और जो परस्पर सहसंयोजी बंध द्वारा नियमित क्रम में जुड़े रहते हैं , आण्विक क्रिस्टल कहलाते हैं ।
जैसे - हीरा , ग्रेफाइट , क्वार्ट्ज(SiO2) , सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) , आदि ।
4. धात्विक क्रिस्टल - ऐसे क्रिस्टलीय ठोस जिनमें अवयवी कणों के रूप में धातु आयन व इलेक्ट्रॉन रहते हैं और जो परस्पर धात्विक बंध द्वारा नियमित क्रम में जुड़े रहते हैं , धात्विक क्रिस्टल कहलाते हैं ।
जैसे - Cu , Zn , Na , Al , Rb , Sn , कांसा , सभी धातुएं एवं मिश्र धातुएं ।
प्रश्न - अक्रिस्टलीय ठोस किसे कहते हैं ? अक्रिस्टलीय ठोसों की विशेषताएं लिखिए ।
उत्तर - अक्रिस्टलीय ठोस(Amorphous Solid) - ऐसे ठोस जिनमें अवयवी कण एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं रहते हैं तथा जिनकी एक निश्चित ज्यामिति नहीं होती है , अक्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं ।
जैसे - प्लास्टिक , रबर , कांच , चमड़ा , लाल फास्फोरस , स्टार्च , सेल्यूलोज , सभी बहुलक आदि ।
अक्रिस्टलीय ठोसों की विशेषताएं -
1. इनकी एक निश्चित ज्यामिति नहीं होती है ।
2. इनमें अवयवी कण एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं ।
3. यह समदैशिक होते हैं ।
4. यह छदम ठोस होते हैं अर्थात् अतिशीतित द्रव होते हैं ।
5. इनके गलनांक एवं क्वथनांक निम्न होते हैं ।
6. इनके अवयवी कणों के मध्य प्रबल आकर्षण नहीं होता है ।
7. यह दृढ़ व असंपीडय नहीं होते है ।
8. यह ऊष्मा एवं विद्युत के कुचालक होते हैं ।
प्रश्न - क्रिस्टलीय एवं अक्रिस्टलीय ठोस में अंतर लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - समदैशिक एवं विषमदैशिक से आप क्या समझते हो ? उदाहरण दीजिए ।
उत्तर - समदैशिक - जब किसी ठोस के गुण जैसे - ऊष्मा , विद्युत चालकता , अपवर्तनांक आदि सभी दिशाओं में समान होते हैं , तब ऐसे पदार्थों को समदैशिक तथा इस गुण को समदैशिकता कहते हैं ।
जैसे -
विषमदैशिक - जब किसी ठोस के गुण जैसे - ऊष्मा , विद्युत चालकता , अपवर्तनांक आदि सभी दिशाओं में समान नहीं होते हैं , तब ऐसे पदार्थों को विषमदैशिक तथा इस गुण को विषमदैशिकता कहते हैं ।
जैसे -
नोट - क्रिस्टलोज - यह एक जर्मन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - शुद्ध या स्वच्छ बर्फ । इसी से क्रिस्टल शब्द की उत्पत्ति हुई है ।
प्रश्न - निम्नलिखित ठोसों को अंतरा आणविक बलों की उपस्थिति के आधार पर विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत कीजिए - (NCERT)
पोटेशियम सल्फेट , टिन , बेंजीन , यूरिया , अमोनिया , जल , जिंक सल्फाइड , ग्रेफाइट , रूबेडियम , आर्गन सिलीकान कार्बाईड ।
उत्तर - 1. आयनिक ठोस - पोटैशियम सल्फेट , जिंक सल्फाइड ।
2. आण्विक ठोस - बेंजीन , यूरिया , अमोनिया , जल , आर्गन ।
3. सहसंयोजी ठोस - ग्रेफाइट , सिलिकॉन कार्बाइड ।
4. धात्विक ठोस - रुबिडियम , टिन ।
प्रश्न - ठोस कठोर क्यों होते हैं ? (NCERT)
उत्तर - ठोसों के अभी-अभी का अणु परमाणु आयन आदि के मध्य दूरी बहुत कम होती है जिसके कारण उन्हें और अधिक नहीं दबाया जा सकता है और इनके मध्य आकर्षण बल अधिक होता है , इसलिए ठोस कठोर होते हैं ।
प्रश्न - धात्विक क्रिस्टल एवं आण्विक क्रिस्टल में अंतर लिखिए ।
अथवा
धात्विक क्रिस्टल एवं आण्विक क्रिस्टल की विशेषताएं लिखिए ।
उत्तर - धात्विक क्रिस्टल की विशेषताएं -
१. इनके अवयवी कणों के मध्य धात्विक बंध पाया जाता है ।
२. इनमें धात्विक चमक पाई जाती है ।
३. इनके गलनांक एवं क्वथनांक उच्च होते हैं ।
आण्विक क्रिस्टल की विशेषताएं -
१. इनके अवयवी कणों के मध्य दुर्बल वांडर वाल्स बंध पाया जाता है ।
२. इनमें चमक नहीं पाई जाती है ।
३. इनके गलनांक एवं क्वथनांक निम्न होते हैं ।
प्रश्न - समन्वयन संख्या से आप क्या समझते हो ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
NaCl व CsCl क्रिस्टल की कोऑर्डिनेशन संख्या बताइए ।
उत्तर - समन्वयन संख्या(Co- ordination Number ) - किसी क्रिस्टल जालक में कोई अवयवी कण जितने पड़ोसी कणों से घिरा रहता है , उसे उस क्रिस्टल की समन्वय संख्या या उपसहसंयोजन संख्या या गोल्ड स्मिथ संख्या या कोऑर्डिनेशन संख्या कहते हैं ।
जैसे - NaCl क्रिस्टल में प्रत्येक सोडियम आयन अपने चारों ओर 6 क्लोरीन आयनों से घिरा रहता है एवं प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 6 सोडियम आयनों से घिरा रहता है , इसलिए सोडियम क्लोराइड(NaCl) की समन्वय संख्या 6:6 होती है ।
इसी प्रकार सीजियम क्लोराइड(CsCl) की समन्वय संख्या 8:8 तथा जिंक सल्फाइड(ZnS) की समन्वय संख्या 4:4 होती है ।
नोट - कैल्शियम फ्लोराइड (CaF2) क्रिस्टल में समन्वय संख्या 8:4 होती है ।
नोट - सोडियम ऑक्साइड (Na2O ) की समन्वय संख्या 4:8 होती है ।
प्रश्न - समन्वयन संख्या को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर - समन्वयन संख्या को प्रभावित करने वाले कारक निम्न है -
1. ताप का प्रभाव - किसी क्रिस्टल का ताप बढ़ाने पर समन्वय संख्या घटती है , क्योंकि ताप के प्रभाव से कुछ पड़ोसी कण अपने नियत स्थान से बाहर निकल जाते हैं ।
उदाहरण - 760K ताप पर CsCl क्रिस्टल की समन्वय संख्या 8:8 से घटकर 6:6 हो जाती है ।
2. दाब का प्रभाव - किसी क्रिस्टल पर दाब बढ़ाने पर समन्वय संख्या एक अनुकूल दाब पर बढ़ जाती है , क्योंकि दाब बढ़ाने पर अवयवी कणों के बीच रिक्त स्थान उपलब्ध हो जाता है जिसमें अतिरिक्त अवयवी कण प्रवेश कर जाते हैं ।
उदहारण - सोडियम क्लोराइड (NaCl) क्रिस्टल पर दाब लगाने पर एक अनुकूल दाब पर समन्वय संख्या 6:6 से बढ़कर 8:8 हो जाती है ।
प्रश्न - निम्न को परिभाषित कीजिए -
1. क्रिस्टल जालक
2. जालक ऊर्जा
3. जालक बिंदु
उत्तर - 1. क्रिस्टल जालक - त्रिविम आकाश में यूनिट सेल को नियमित क्रम में व्यवस्थित करने पर जो संरचना बनती है , उसे क्रिस्टल जालक कहते हैं ।
अवयवी कण परस्पर मिलकर यूनिट सेल का निर्माण करते हैं और कई यूनिट सेल नियमित व्यवस्था में जुड़कर क्रिस्टल जालक का निर्माण करते हैं ।
2. जालक ऊर्जा - किसी एक मोल क्रिस्टल को पूर्णतः अवयवी कणों में विभक्त करने के लिए जो ऊर्जा प्रयुक्त होती है , उसे क्रिस्टल की जालक ऊर्जा कहते हैं ।
जालक ऊर्जा का मान जितना अधिक होता है क्रिस्टल उतना ही अधिक स्थाई होता है ।
3. जालक बिंदु - किसी क्रिस्टल जालक में कोई अवयवी कण जो स्थान ग्रहण करता है , उसे उसका जालक बिंदु कहते हैं ।
प्रश्न - यूनिट सेल या एकक सेल किसे कहते हैं ? घनीय यूनिट सेल के प्रकार लिखिए ।
उत्तर - यूनिट सेल - किसी क्रिस्टल जालक का वह छोटे से छोटा भाग जो उस क्रिस्टल जालक के प्रतिरूप को पूर्णतः प्रदर्शित करता है , इकाई कोशिका या यूनिट सेल या एकक कोष्ठिका या एकक कोशिका कहलाता है ।
अथवा
किसी क्रिस्टल का सूक्ष्मतम संरचनात्मक भाग जिसे त्रिविम में बार-बार पुनरावृति करने पर क्रिस्टल की संपूर्ण संरचना का निर्माण होता है , एकक सेल कहलाता है ।
अथवा
किसी क्रिस्टल में उसके अवयवी कणों के क्रमबद्ध रूप से व्यवस्थित होने पर जो सूक्ष्मतम इकाई बनती है , उसे क्रिस्टल की एकक कोष्ठिका या यूनिट सेल कहते हैं ।
यूनिट सेल के प्रकार -
1. SCC (Simple cubic cell) - साधारण घनीय सेल
2. BCC (Body Centered cubic cell) - अंतः केंद्रित घनीय सेल या काय केंद्रित घनीय सेल
3. FCC (Face centered cubic cell) - फलक केंद्रित घनीय सेल
1. S.C.C. - वह यूनिट सेल जो 8 अवयवी कणों से मिलकर बना होता है तथा जिसमें प्रत्येक अवयवी कण यूनिट सेल के कोनों पर स्थित होता है , SCC कहलाता है । इसमें व्यवस्था में अवयवी कणों द्वारा 52.34% स्थान घेरा जाता है और इनमें समन्वयन संख्या 6 होती है ।
अवयवी कणो का योगदान - साधारण घनीय यूनिट सेल में 8 अवयवी कण कोनों पर स्थित रहते हैं तथा प्रत्येक अवयवी कण का 8 यूनिट सेल द्वारा विभाजन होता है इसलिए एक यूनिट सेल को एक अवयवी कण का 1/8 भाग प्राप्त होता है । अतः
अवयवी कणों का योगदान = 1/8 × 8 (कोनों पर )
Z = 1
2. BCC - वह यूनिट सेल जो 9 अवयवी कणों से मिलकर बना होता है और जिसमें 8 अवयवी कण यूनिट सेल के कोनो पर तथा एक अवयवी कण यूनिट सेल के केंद्र में स्थित रहता है , काय केंद्रित घनीय सेल या अंतः केंद्रित घनीय सेल कहलाता है ।
इस व्यवस्था में अवयवी कणों द्वारा 68% स्थान घेरा जाता है और BCC में समन्वय संख्या 8 होती है।
अवयवी कणो का योगदान -
BCC मे कोनो पर स्थित 8 अवयवी कणों का यूनिट सेल को 1/8 भाग तथा केंद्र पर स्थित एक अवयवी कण का पूरा भाग प्राप्त होता है ।
अवयवी कणों का योगदान = 1/8 × 8 (कोनों पर ) + 1(केंद्र पर स्थित)
Z = 1 + 1
Z = 2
3. FCC - वह यूनिट सेल जो 14 अवयवी कणों से मिलकर बना होता है और जिसमें 8 अवयवी कण यूनिट सेल के कोनो पर तथा 6 अवयवी कण फलक के केंद्र में स्थित रहते है । FCC कहलाता है ।
इस व्यवस्था में अवयवी कणों द्वारा 74% स्थान घेरा जाता है और FCC में समन्वय संख्या 12 होती है।
अवयवी कणो का योगदान -
FCC मे कोनो पर स्थित 8 अवयवी कणों का यूनिट सेल को 1/8 भाग तथा फलक के केंद्र पर स्थित 6 अवयवी कण का 1/2 भाग प्राप्त होता है । अतः
अवयवी कणों का योगदान = 1/8 × 8 (कोनों पर ) + 1/2 × 6(फलक पर )
Z = 1 + 3
Z = 4
प्रश्न - एक घनीय संरचना वाले ठोस के यूनिट सेल के कोने पर A , केंद्र पर B , तथा फलक के केंद्र पर C परमाणु उपस्थित हैं , तब ठोस का सूत्र होगा -
१). ABC
२). ABC3
३). AB3C
४). A2BC
प्रश्न - एक घनीय संरचना वाले ठोस के यूनिट सेल के कोनों पर X परमाणु तथा फलक के केंद्र पर Y परमाणु उपस्थित हैं , तब ठोस का सूत्र होगा -
१). XY
२). XY2
३). X3Y
४). XY3
प्रश्न - घनीय यूनिट सेल के घनत्व की गणना कीजिए ।
अथवा
घनी यूनिट सेल का घनत्व ज्ञात करने का सूत्र लिखिए ।
उत्तर - किसी घनीय यूनिट सेल के घनत्व की गणना करने के लिए निम्न सूत्र का उपयोग करते हैं -
d = Z M/a3.N
यहां -
d = यूनिट सेल का घनत्व
Z = यूनिट सेल में उपस्थित परमाणुओं की संख्या
M = परमाणु द्रव्यमान
a = आयतन
N = एवोगाद्रो संख्या
नोट - 1Pm = 10*-10cm = 10*-12m
प्रश्न - संकुलन किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर - संकुलन - जालक में निर्माण घटकों की व्यवस्था संकुलन या सुसंकलन कहलाती है ।
अथवा
क्रिस्टल के निर्माण घटक इस प्रकार संकुलित रहते हैं कि क्रिस्टल का घनत्व व स्थायित्व अधिकतम रहे ।
प्रकार - ठोस क्रिस्टल में संकुलन दो प्रकार का होता है -
१). एक विमीय संकुलन
२). द्विविमीय संकुलन
३). त्रिविमीय संकुलन
१). एक विमीय संकुलन - यहां गोलों को एक पंक्ति में एक दूसरे से स्पष्ट करते हुए व्यवस्थित किया जाता है । इस प्रकार की व्यवस्था में प्रत्येक गोला दो निकटवर्ती गोलों के संपर्क में होता है अर्थात उपसहसंयोजन संख्या दो होती है ।
२). द्विविमीय संकुलन - में दो प्रकार से व्यवस्थित किया जा सकता है -
a). वर्गाकार घनिष्ठ संकुलन(Square close packing - scp) - इस संकुलन द्वितीय पंक्ति को प्रथम पंक्ति के संपर्क में इस प्रकार रखा जाता है कि द्वितीय पंक्ति के गोले के ठीक ऊपर प्रथम पंक्ति के गोले हों एवं दोनों पंक्तियों के केंद्र क्षेतिज एवं ऊर्ध्वाधर रूप से संरेखित हो । इस संकुलन में उपसहसंयोजन संख्या 4 होती है । तथा इस संकुलन में 52.4% स्थान घेरा जाता है ।
b). षटकोणीय घनिष्ठ संकुलन(Hexagonal close packing-hcp)- इस संकुलन में द्वितीय पंक्ति को प्रथम पंक्ति के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि इस के गोले प्रथम पंक्ति के अवनमनों में समावित हो जाएं । इसमें उपसहसंयोजन संख्या 6 होती है और इस प्रकार की व्यवस्था में 60.4% स्थान घेरा जाता है ।
३). त्रिविमीय संकुलन - सभी वास्तविक संरचनाएं त्रिविमीय होती हैं जो कि द्विविमीय परतों को एक के ऊपर एक रखने से प्राप्त होती है -
a). द्विविमीय वर्गाकार घनिष्ट संकुलन की परतों से त्रिविमीय घनिष्ठ संकुलन का निर्माण -
जब द्वितीय परत को प्रथम परत के ऊपर रखा जाता है तो ऊपरी परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ऊपर रहते हैं यदि प्रथम परत व्यवस्था के गोलों को A नाम दिया जाए तो सभी परते A व्यवस्था की होती हैं , इस प्रकार हमें AAA पैटर्न प्राप्त होता है ।
b). द्विविमीय षटकोणीय घनिष्ट संकुलन की परतों से त्रिविमीय घनिष्ठ संकुलन का निर्माण - इस व्यवस्था में त्रिविमीय घनिष्ठ संकुलन का निर्माण द्विविमीय षटकोणीय घनिष्ठ संकुलन की परतों को एक के ऊपर एक त्रिविम में रखने से होता है ।
प्रश्न - चतुष्फलकीय एवं अष्टफलकीय रिक्तियां किसे कहते हैं ? इनके गुण लिखिए ।
उत्तर - A. चतुष्फलकीय रिक्तियां -
B. अष्टफलकीय रिक्तियां -
प्रश्न - अष्टफलकीय एवं चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण लिखिए ।
उत्तर - चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या से दुगनी होती है ।
2. प्रत्येक गोले से दो चतुष्फलकीय रिक्तियां संबंध रहती हैं ।
3. चतुष्फलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.225 गुना होता है ।
4. चतुष्फलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 4 होती है
अष्टफलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या के बराबर होती है ।
2. प्रत्येक गोले से एक अष्टफलकीय रिक्ति संबंध रहती हैं ।
3. अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.414 गुना होता है ।
4. अष्टफलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 6 होती है
नोट - अष्टफलकीय रिक्तियां चतुष्फलकीय रिक्तियों से बड़ी होती हैं ।
प्रश्न - NaCl एवं CsCl क्रिस्टल की सरंचना समझाइए ।
उत्तर - NaCl की रॉक साल्ट सरंचना - सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना FCC या CCP प्रकार की होती है । जिसमें सोडियम आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहती है । इसमें सोडियम आयन अपने चारों ओर 6 क्लोरीन आयनों से एवं प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 6 सोडियम आयनों से घिरा रहता है । इसलिए सोडियम क्लोराइड (NaCl) की समन्वय संख्या 6:6 होती है । FCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल में परमाणुओं की संख्या चार होती है ।
चित्र - नीचे चित्र में NaCl की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें सोडियम आयन को खाली गोले तथा क्लोरीन आयन को ठोस गोले से प्रदर्शित किया गया है -
नोट - NaCl के समान लिथियम व रूबेडियम के हैलाइड , बेरिलियम व स्ट्रांशियम के ऑक्साइड एवं सल्फाइड की संरचना भी होती है।
(2). CsCl की सरंचना - CsCl क्रिस्टल की संरचना BCC प्रकार की होती है जिसमें सीजियम आयन व क्लोरीन आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहते हैं । इसमें Cs आयन व Cl आयन अपने नियमित व्यवस्था में जुड़े रहते हैं । जिसमें प्रत्येक Cs आयन अपने चारों ओर 8 क्लोरीन आयनों से घिरा रहता है तथा प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 8 Cs आयनों से घिरा रहता है तथा इसलिए CsCl की समन्वय संख्या 8:8 होती है।
इसमें Cs आयन घन के कोने पर Cl आयन घन के केंद्र में स्थित रहते हैं या फिर इसके ठीक विपरीत व्यवस्था होती है ।
[ ] BCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 2 होनी चाहिए किंतु Cs आयन के बड़े आकार के कारण सरंचना विकृत होती है । जिससे प्रति यूनिट परमाणुओं की संख्या 1 होती है ।
[ ] CsCl की संरचना को नीचे चित्र में प्रदर्शित किया गया है जिसमें Cs आयन को खाली गोले एवं क्लोरीन आयन को ठोस गोले से दर्शाया गया है।
नोट - CsCl सरंचना के समान CsBr , CsI , TlCl , TlBr आदि क्रिस्टलों की संरचना भी होती है ।
(3). ZnS की सरंचना - ZnS की सरंचना FCC या CCP प्रकार की होती है जिसमे Zn आयन अष्टफलकीय रिक्ति में तथा सल्फाइड आयन चतुष्फलकीय रिक्ति में व्यवस्थित रहते हैं । इसमें प्रत्येक Zn आयन अपने चारों ओर 4 सल्फाइड आयनों से एवं प्रत्येक सल्फाइड आयन अपने चारों ओर 4 Zn आयनों से घिरा रहता है । इसलिए जिंक सल्फाइड की समन्वय संख्या 4:4 होती है । FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं का योगदान 4 होता है ।
चित्र - नीचे चित्र में जिंक सल्फेट की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें Zn आयनों को खाली गोले एवं सल्फाइड आयनों को ठोस गोले से दर्शाया गया है -
नोट - ZnS के समान CuCl , CuBr , HgS आदि की क्रिस्टलों की सरंचना भी होती है ।
प्रश्न - CaF2 की फ्लोराइट सरंचना एवं Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना को समझाइए ।
उत्तर - 1). CaF2 की फ्लोराइट सरंचना - CaF2 की फ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक कैल्शियम आयन अपने चारों ओर 8 फ्लोराइड आयनों से एवं प्रत्येक फ्लोरीन आयन अपने चारों ओर 4 कैल्शियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे कैल्शियम फ्लोराइड की समन्वय संख्या 8:4 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की संरचना SrF2 , BaF2 , CdF2 आदि क्रिस्टलों एवं लैंथेनाइड और एक्टिनाइड के ऑक्साइड में भी होती है ।
2). Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना - Na2O की एंटीफ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक सोडियम आयन अपने चारों ओर 4 , ऑक्सीजन आयनों से एवं प्रत्येक ऑक्सीजन आयन अपने चारों ओर 8 , सोडियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे Na2O की समन्वय संख्या 4:8 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की सरंचना Li2O , K2O , K2S आदि क्रिस्टलों की भी होती है ।
3). स्पाइनल सरंचना - खनिज MgAlO4 को स्पाइनल कहते हैं । इस प्रकार की संरचना AB2O4 प्रकार के अणुओं की भी होती है ।
जैसे - फेराइट्स(ZnFe2O4)
इसमें A2+ आयन चतुष्फलकीय की रिक्ति में , B3+ आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहता है । इसमें अवयवी कण FCC व्यवस्था में व्यवस्थित रहते हैं । इसलिए प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं ? इसका महत्त्व लिखिए ।
उत्तर - त्रिज्या अनुपात - किसी आयनिक क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते हैं ।
माना किसी क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या r+ एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या r- है । तब -
त्रिज्या अनुपात = r+/r-
महत्व - त्रिज्या अनुपात द्वारा क्रिस्टल की समन्वय संख्या व संरचनात्मक व्यवस्था स्पष्ट होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात एवं समन्वय संख्या में संबंध लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - एक क्रिस्टल में A+ की त्रिज्या 60 pm तथा B की त्रिज्या 136 pm है , तब इस क्रिस्टल की संरचना एवं समन्वय संख्या बताइए ।
हल - दिया है - धनायन की आयनिक त्रिज्या = 60 pm
ऋणायन की आयनिक त्रिज्या = 136 pm
सरंचना व समन्वय संख्या = ?
सूत्र - त्रिज्या अनुपात = r+/r-
सूत्र में मान रखने पर -
= 60/136
= 0.441
चूंकि त्रिज्या अनुपात का मान 0.441 है अतः क्रिस्टल की सरंचना अष्टफलकीय व समन्वय संख्या 6 होगी ।
प्रश्न - एक क्रिस्टल AB में A+ की त्रिज्या 95 pm तथा B- की त्रिज्या 181 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - एक क्रिस्टल XY में X+ की त्रिज्या 181 pm तथा Y- की त्रिज्या 235 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - ब्रैग समीकरण लिखिए ।
उत्तर - ब्रैग समीकरण - लॉरेंस ब्रैग क्रिस्टलों के तलों के बीच की दूरी ज्ञात करने के लिए एक समीकरण प्रस्तुत किया , जिसे ब्रैग समीकरण कहते हैं ।
यह समीकरण निम्न है -
यहाँ -
n = सतहों की संख्या
d = दो सतहों के बीच की दूरी
लैम्डा = किरणों का तरंगधैर्य
थीटा = आपतन कोण
प्रश्न - ठोसों में अपूर्णता या त्रुटि से आप क्या समझते हो ? यह किन कारणों से उत्पन्न होती हैं ?
उत्तर - अपूर्णता या त्रुटि (Defects) - किसी क्रिस्टल में अभी-अभी कणों की अव्यवस्था या अशुद्धि के प्रवेश से जो कमी उत्पन्न होती है उसे अपूर्णता या त्रुटि कहते हैं ।
क्रिस्टलों में त्रुटि निम्न तीन कारणों से उत्पन्न होती है -
1. ताप के कारण 2. अशुद्धि के कारण 3. क्रिस्टलीकरण के कारण
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस में अपूर्णताओं को कितने प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है ?
उत्तर -
प्रश्न - बिंदु दोष किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बिंदु दोष (Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं यह आयनों की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को , बिंदु दोष या बिंदु त्रुटि कहते हैं ।
बिंदु दोष के प्रकार - बिंदु दोष निम्न तीन प्रकार के होते हैं -
1. रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
2. अरस समीकरण मितीय त्रुटि (Non stichiometric defects)
3. अशुद्धता त्रुटि (Impurity defects)
वर्गीकरण - क्रिस्टल में त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती हैं -
1. इलेक्ट्रॉनिक त्रुटि (Electronic defects) - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ). n- प्रकार के अर्धचालक
ब). p- प्रकार के अर्धचालक
2. बिंदु त्रुटि(Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं या आयनो की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को बिंदु त्रुटि कहते हैं । यह त्रुटि धनायनों या ऋणायनों के अपने उचित स्थान से विचलित होने के कारण उत्पन्न होते हैं ।
यह त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती है -
अ). रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
ब). अरस समीकरणमितीय त्रुटि (Non-Stichiometric defects)
स). अशुद्धि त्रुटि (Impurity defects)
3. परमाण्विक त्रुटि - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ).
ब).
प्रश्न - रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) किसे कहते हैं ? इसके प्रकारों को समझाइए ?
उत्तर - रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) - वे दोष जो यौगिक की स्टाइकियोमैट्री को परिवर्तित नहीं करते हैं , स्टाइकियोमेट्रिक दोष कहलाते हैं ।
इन दोषों के कारण अवयवी तत्व रससमीकरणमितिय अनुपात में पाए जाते हैं अर्थात त्रुटि उत्पन्न होने के बाद भी धनायन व ऋणायन का अनुपात वही बना रहता है जो रासायनिक सूत्र में त्रुटि उत्पन्न होने के पूर्व होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को रससमीकरणमितीय क्रिस्टल व इस समीकरण को रससमीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
प्रकार - यह त्रुटि निम्न प्रकार की होती है -
A). रिक्ति दोष
B). अंतराकाशी दोष
C). शॉटकी दोष
D). फ्रेंकेल दोष
A). रिक्ति दोष -
B). अंतराकाशी दोष -
C). शॉटकी दोष - जब किसी आयनिक क्रिस्टल में कुछ धनायन अपने स्थान को छोड़कर क्रिस्टल में से बाहर निकल जाते हैं और क्रिस्टल में रिक्तिकाएं अर्थात् होल बना लेते हैं तब इसे शॉटकी दोष कहते हैं । इस प्रकार के दोष आयनिक क्रिस्टलों में पाए जाते हैं । जिनमें धनायन व ऋणायन का आकार लगभग समान होता है । और उनकी समन्वय संख्या उच्च होती है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है । इस प्रकार की त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
उदाहरण - NaCl , KCl , KBr , CsCl , RbCl , AgBr आदि ।
D). फ्रेंकेल दोष - इस प्रकार का दोष तब उत्पन्न होता है जब कोई धनायन या ऋणायन अपने नियत स्थान से हटकर अंतराकाशी स्थान में जाकर फिट हो जाता है । परिणाम स्वरूप उसके नियत स्थान पर एक छिद्र अर्थात होल बन जाता है । यह दोष ऐसे यौगिकों के क्रिस्टलों में पाए जाते हैं जिनमें आयनो की समन्वय संख्या निम्न होती है तथा धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में बहुत कम होता है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है । इस प्रकार की त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
जैसे - ZnS , AgCl , AgBr , AgI , ZnO आदि ।
नोट - AgBr , शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि दोनों प्रदर्शित करता है ।
प्रश्न - शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि में अंतर लिखिए ।
उत्तर - शॉटकी त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ।
2. इसमें धनायन एवं ऋण आयन का आकार लगभग समान होता है ।
3. इस त्रुटि में धनायन व ऋणायन क्रिस्टल से बाहर निकल जाते हैं ।
4. यह त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या अधिक होती है।
फ्रैंकेल त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है।
2. इसमें धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में छोटा होता है।
3. इस त्रुटि में धनायन क्रिस्टल के अंतराकाशी स्थानों में आ जाते हैं ।
4. यह त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या निम्न होती है ।
प्रश्न - सिल्वर क्लोराइड (AgBr) फ्रेंकल दोष प्रकट करता है , जबकि सोडियम क्लोराइड(NaCl) नहीं क्यों ? कारण स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
क्षारीय धातुओं के हैलाइडों में फ्रैंकल दोष नहीं पाया जाता है , क्यों ?
उत्तर - सोडियम क्लोराइड(NaCl) या क्षारीय धातु के हैलाइड फ्रेंकल दोष प्रकट नहीं करते हैं , क्योंकि सोडियम आयन या क्षारीय धातु आयन का आकार इतना बड़ा होता है कि वह अंतराकाशी रिक्तियों में प्रवेश नहीं कर पाता है ।
जबकि AgBr में सिल्वर आयन का आकार छोटा होता है इसलिए यह अंतरकाशीय रिक्तियों में प्रवेश कर जाता है और फ्रेंकल दोष प्रकट करने लगता है ।
प्रश्न - अरससमीकरणमितीय त्रुटि किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती हैं , समझाइए ।
उत्तर - अरससमीकरणमितीय त्रुटि (Non- Stichiometric defects) - जब किसी क्रिस्टल में त्रुटि उत्पन्न होने के बाद धनायन व ऋणायन का अनुपात उसके रासायनिक सूत्र में प्रदर्शित अनुपात से भिन्न होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को अरस समीकरणमितीय क्रिस्टल कहते हैं । तथा इस त्रुटि को अरस समीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
उदाहरण - FeO , FeS , CuS , CuO , NiO , TiO आदि ।
यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
1. धनायन कि अधिकता (धातु आधिक्य)
2. ऋणायन की अधिकता (अधातु आधिक्य)
A. धातु आयन की अधिकता - यह त्रुटि नििम्न दो प्रकार से उत्पन्न होती है -
अ). ताप के प्रभाव से
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से
अ). ताप के प्रभाव से - जब किसी आयनिक क्रिस्टल जैसे - सोडियम क्लोराइड को गर्म करते हैं तब क्रिस्टल में उपस्थित कुछ ऋण आयन अपने नियत स्थान पर इलेक्ट्रॉन छोड़कर बाहर निकल जाते हैं जिससे इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस क्षेत्र को F - केंद्र कहते हैं । यह क्रिस्टल के रंग को निर्धारित करता है । इस F - केन्द्र के कारण NaCl क्रिस्टल पीले भूरे रंग का होता है । और इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण क्रिस्टल विद्युत उदासीन बना रहता है किंतु क्रिस्टल में धातु आयन (धनायन) की संख्या अधिक एवं अधातु आयन (ऋणायन) की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से - जब किसी क्रिस्टल जालक में अतिरिक्त धनायन अंतराकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाता है । तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ इलेक्ट्रॉन भी अंतरकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाते हैं । इसलिए क्रिस्टल में धनायन की संख्या अधिक व ऋणायन की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
जैसे - जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल में ।
B. अधातु आयन की अधिकता - इस प्रकार की त्रुटि संक्रमण तत्वों से बने क्रिस्टल में होती है क्योंकि इनमें परिवर्ति ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति होती है । क्रिस्टल के निर्माण के समय जब कोई धनायन अपने नियत स्थान पर प्रवेश नहीं कर पाता है तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ धनायन इलेक्ट्रॉन खोकर कुछ ऑक्सीकरण अवस्था में चले जाते हैं । जिससे क्रिस्टल में धनायन की संख्या कम व ऋणायन की संख्या अधिक हो जाती है अर्थात अधातु आयन की अधिकता होती है ।
जैसे - आयरन ऑक्साइड (FeO) क्रिस्टल में ।
प्रश्न - अशुद्धि दोष से आप क्या समझते हो ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अशुद्धि दोष - जब जालक में किसी वह पदार्थ अर्थात अशुद्धि की उपस्थिति होने से दोष उत्पन्न होता है तो उसे अशुद्ध दोष कहते हैं तथा इस क्रिया को डोपिंग कहते हैं । जिससे विद्युत चालकता में वृद्धि होती है और उसके गुणों विशेषतः चालकता गुणों में परिवर्तन आ जाता है ।
अशुद्धियों की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार की रासायनिक अशुद्धियां होती हैं -
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि
B. आयनों की अशुद्धि
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि - जब गलित अवस्था में किसी धात्विक क्रिस्टल में बाहर से अन्य तत्व के परमाणु अशुद्धि के रूप में डाले जाते हैं तब अशुद्धि के परमाणु क्रिस्टल के अंतराकाशी रिक्ति में आ जाते हैं या क्रिस्टल के मूल परमाणु को विस्थापित करके ठोस विलयन बनाते हैं ।
Ge तथा Si के के क्रिस्टल अशुद्धि दोष प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इनकी चालकता बढ़ जाती है ।
उदाहरण - जब समूह 14 के तत्वों में समूह 13 या समूह 15 के तत्व अशुद्धि के रूप में मिलाए जाते हैं तब इनकी चालकता बढ़ जाती है और यह धातु अर्द्ध चालक हो जाते हैं ।
B. आयनों की अशुद्धि - आयनिक ठोस में आयनों की अशुद्धि के मिला देने पर भी अशुद्धि दोष उत्पन्न हो जाते हैं ।
प्रश्न - डोपिंग किसे कहते हैं ।
उत्तर - डोपिंग - किसी शुद्ध पदार्थ में अशुद्धि की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर उसके गुणों में परिवर्तन करने की प्रक्रिया डोपिंग कहलाती है ।
इस प्रक्रिया द्वारा n व p - प्रकार के अर्धचालक बनाए जाते हैं और इन अर्ध चालकों का उपयोग ट्रांजिस्टर , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - F - केन्द्र किसे कहते हैं ? किसी क्रिस्टल पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर - F - केन्द्र - जब किसी कस्टल को गर्म किया जाता है तब उसमें से ऋणायन परमाणु के रूप में बाहर निकल जाता है , तब इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र बनते हैं , जिसे F - केंद्र कहते हैं ।
F - केंद्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश से एक निश्चित ऊर्जा वाले विकिरण का अवशोषण करते हैं और शेष प्रकाश को परिवर्तित करते हैं । इस परावर्तित प्रकाश के कारण क्रिस्टल रंगीन दिखाई देता है ।
जैसे - NaCl क्रिस्टल पीला , LiCl - गुलाबी , KCl बैगनी , ZnO - पीले रंग का होता है ।
प्रश्न - अर्द्ध चालक किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अर्धचालक -(Simeconductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता धातुओं एवं अधातुओं के मध्य होती है , अर्द्ध चालक कहलाते हैं । इनकी चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
प्रकार - अर्द्ध चालक निम्न दो प्रकार के होते है -
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप)
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप)
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 15 के तत्वों (P या As) को मिलाया जाता है तब n - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता ऋण आवेशित अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होती है ।
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 13 के तत्वों (B , Al या Ga) को मिलाया जाता है तब p - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता धन आवेशित अतिरिक्त छिद्रों की गति के कारण होती है ।
अर्धचालकों के उपयोग - अर्धचालक को संयुक्त करके डायोड बनाए जाते हैं जिनका उपयोग रेडियो , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - समूह 14 के तत्व को n - प्रकार के अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपांतरित करना है । यह अशुद्धि किस वर्ग से संबंधित होनी चाहिए ।
उत्तर - n - प्रकार के अर्धचालक वे होते हैं जिनकी चालकता में वृद्धि इलेक्ट्रॉनों के आधिक्य के कारण हुई है या की गई है ।
Si या Ge चौदहवें समूह के तत्व हैं और प्रत्येक में 4 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं इनके क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटतम परमाणुओं के साथ 4 सहसंयोजक बंध बनाता है ।
जब 15वें समूह के तत्व जैसे P या As , जिनमें अनेक जिनमें पांच संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं , को इसके साथ अपमिश्रित किया जाता है , तब यह Si या Ge के कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं ।
पांच में से चार इलेक्ट्रॉन Si परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध बनाने में प्रयुक्त हो जाते हैं और पांचवा अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थापित हो जाता है यह विस्थापित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित Si या Ge की चालकता में वृद्धि कर देता है । यहां चालकता
उत्तर - चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या से दुगनी होती है ।
2. प्रत्येक गोले से दो चतुष्फलकीय रिक्तियां संबंध रहती हैं ।
3. चतुष्फलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.225 गुना होता है ।
4. चतुष्फलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 4 होती है
अष्टफलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या के बराबर होती है ।
2. प्रत्येक गोले से एक अष्टफलकीय रिक्ति संबंध रहती हैं ।
3. अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.414 गुना होता है ।
4. अष्टफलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 6 होती है
नोट - अष्टफलकीय रिक्तियां चतुष्फलकीय रिक्तियों से बड़ी होती हैं ।
प्रश्न - NaCl एवं CsCl क्रिस्टल की सरंचना समझाइए ।
उत्तर - NaCl की रॉक साल्ट सरंचना - सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना FCC या CCP प्रकार की होती है । जिसमें सोडियम आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहती है । इसमें सोडियम आयन अपने चारों ओर 6 क्लोरीन आयनों से एवं प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 6 सोडियम आयनों से घिरा रहता है । इसलिए सोडियम क्लोराइड (NaCl) की समन्वय संख्या 6:6 होती है । FCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल में परमाणुओं की संख्या चार होती है ।
चित्र - नीचे चित्र में NaCl की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें सोडियम आयन को खाली गोले तथा क्लोरीन आयन को ठोस गोले से प्रदर्शित किया गया है -
नोट - NaCl के समान लिथियम व रूबेडियम के हैलाइड , बेरिलियम व स्ट्रांशियम के ऑक्साइड एवं सल्फाइड की संरचना भी होती है।
(2). CsCl की सरंचना - CsCl क्रिस्टल की संरचना BCC प्रकार की होती है जिसमें सीजियम आयन व क्लोरीन आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहते हैं । इसमें Cs आयन व Cl आयन अपने नियमित व्यवस्था में जुड़े रहते हैं । जिसमें प्रत्येक Cs आयन अपने चारों ओर 8 क्लोरीन आयनों से घिरा रहता है तथा प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 8 Cs आयनों से घिरा रहता है तथा इसलिए CsCl की समन्वय संख्या 8:8 होती है।
इसमें Cs आयन घन के कोने पर Cl आयन घन के केंद्र में स्थित रहते हैं या फिर इसके ठीक विपरीत व्यवस्था होती है ।
[ ] BCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 2 होनी चाहिए किंतु Cs आयन के बड़े आकार के कारण सरंचना विकृत होती है । जिससे प्रति यूनिट परमाणुओं की संख्या 1 होती है ।
[ ] CsCl की संरचना को नीचे चित्र में प्रदर्शित किया गया है जिसमें Cs आयन को खाली गोले एवं क्लोरीन आयन को ठोस गोले से दर्शाया गया है।
नोट - CsCl सरंचना के समान CsBr , CsI , TlCl , TlBr आदि क्रिस्टलों की संरचना भी होती है ।
(3). ZnS की सरंचना - ZnS की सरंचना FCC या CCP प्रकार की होती है जिसमे Zn आयन अष्टफलकीय रिक्ति में तथा सल्फाइड आयन चतुष्फलकीय रिक्ति में व्यवस्थित रहते हैं । इसमें प्रत्येक Zn आयन अपने चारों ओर 4 सल्फाइड आयनों से एवं प्रत्येक सल्फाइड आयन अपने चारों ओर 4 Zn आयनों से घिरा रहता है । इसलिए जिंक सल्फाइड की समन्वय संख्या 4:4 होती है । FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं का योगदान 4 होता है ।
चित्र - नीचे चित्र में जिंक सल्फेट की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें Zn आयनों को खाली गोले एवं सल्फाइड आयनों को ठोस गोले से दर्शाया गया है -
नोट - ZnS के समान CuCl , CuBr , HgS आदि की क्रिस्टलों की सरंचना भी होती है ।
प्रश्न - CaF2 की फ्लोराइट सरंचना एवं Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना को समझाइए ।
उत्तर - 1). CaF2 की फ्लोराइट सरंचना - CaF2 की फ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक कैल्शियम आयन अपने चारों ओर 8 फ्लोराइड आयनों से एवं प्रत्येक फ्लोरीन आयन अपने चारों ओर 4 कैल्शियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे कैल्शियम फ्लोराइड की समन्वय संख्या 8:4 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की संरचना SrF2 , BaF2 , CdF2 आदि क्रिस्टलों एवं लैंथेनाइड और एक्टिनाइड के ऑक्साइड में भी होती है ।
2). Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना - Na2O की एंटीफ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक सोडियम आयन अपने चारों ओर 4 , ऑक्सीजन आयनों से एवं प्रत्येक ऑक्सीजन आयन अपने चारों ओर 8 , सोडियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे Na2O की समन्वय संख्या 4:8 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की सरंचना Li2O , K2O , K2S आदि क्रिस्टलों की भी होती है ।
3). स्पाइनल सरंचना - खनिज MgAlO4 को स्पाइनल कहते हैं । इस प्रकार की संरचना AB2O4 प्रकार के अणुओं की भी होती है ।
जैसे - फेराइट्स(ZnFe2O4)
इसमें A2+ आयन चतुष्फलकीय की रिक्ति में , B3+ आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहता है । इसमें अवयवी कण FCC व्यवस्था में व्यवस्थित रहते हैं । इसलिए प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं ? इसका महत्त्व लिखिए ।
उत्तर - त्रिज्या अनुपात - किसी आयनिक क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते हैं ।
माना किसी क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या r+ एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या r- है । तब -
त्रिज्या अनुपात = r+/r-
महत्व - त्रिज्या अनुपात द्वारा क्रिस्टल की समन्वय संख्या व संरचनात्मक व्यवस्था स्पष्ट होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात एवं समन्वय संख्या में संबंध लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - एक क्रिस्टल में A+ की त्रिज्या 60 pm तथा B की त्रिज्या 136 pm है , तब इस क्रिस्टल की संरचना एवं समन्वय संख्या बताइए ।
हल - दिया है - धनायन की आयनिक त्रिज्या = 60 pm
ऋणायन की आयनिक त्रिज्या = 136 pm
सरंचना व समन्वय संख्या = ?
सूत्र - त्रिज्या अनुपात = r+/r-
सूत्र में मान रखने पर -
= 60/136
= 0.441
चूंकि त्रिज्या अनुपात का मान 0.441 है अतः क्रिस्टल की सरंचना अष्टफलकीय व समन्वय संख्या 6 होगी ।
प्रश्न - एक क्रिस्टल AB में A+ की त्रिज्या 95 pm तथा B- की त्रिज्या 181 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - एक क्रिस्टल XY में X+ की त्रिज्या 181 pm तथा Y- की त्रिज्या 235 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - ब्रैग समीकरण लिखिए ।
उत्तर - ब्रैग समीकरण - लॉरेंस ब्रैग क्रिस्टलों के तलों के बीच की दूरी ज्ञात करने के लिए एक समीकरण प्रस्तुत किया , जिसे ब्रैग समीकरण कहते हैं ।
यह समीकरण निम्न है -
यहाँ -
n = सतहों की संख्या
d = दो सतहों के बीच की दूरी
लैम्डा = किरणों का तरंगधैर्य
थीटा = आपतन कोण
प्रश्न - ठोसों में अपूर्णता या त्रुटि से आप क्या समझते हो ? यह किन कारणों से उत्पन्न होती हैं ?
उत्तर - अपूर्णता या त्रुटि (Defects) - किसी क्रिस्टल में अभी-अभी कणों की अव्यवस्था या अशुद्धि के प्रवेश से जो कमी उत्पन्न होती है उसे अपूर्णता या त्रुटि कहते हैं ।
क्रिस्टलों में त्रुटि निम्न तीन कारणों से उत्पन्न होती है -
1. ताप के कारण 2. अशुद्धि के कारण 3. क्रिस्टलीकरण के कारण
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस में अपूर्णताओं को कितने प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है ?
उत्तर -
प्रश्न - बिंदु दोष किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बिंदु दोष (Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं यह आयनों की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को , बिंदु दोष या बिंदु त्रुटि कहते हैं ।
बिंदु दोष के प्रकार - बिंदु दोष निम्न तीन प्रकार के होते हैं -
1. रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
2. अरस समीकरण मितीय त्रुटि (Non stichiometric defects)
3. अशुद्धता त्रुटि (Impurity defects)
वर्गीकरण - क्रिस्टल में त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती हैं -
1. इलेक्ट्रॉनिक त्रुटि (Electronic defects) - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ). n- प्रकार के अर्धचालक
ब). p- प्रकार के अर्धचालक
2. बिंदु त्रुटि(Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं या आयनो की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को बिंदु त्रुटि कहते हैं । यह त्रुटि धनायनों या ऋणायनों के अपने उचित स्थान से विचलित होने के कारण उत्पन्न होते हैं ।
यह त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती है -
अ). रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
ब). अरस समीकरणमितीय त्रुटि (Non-Stichiometric defects)
स). अशुद्धि त्रुटि (Impurity defects)
3. परमाण्विक त्रुटि - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ).
ब).
प्रश्न - रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) किसे कहते हैं ? इसके प्रकारों को समझाइए ?
उत्तर - रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) - वे दोष जो यौगिक की स्टाइकियोमैट्री को परिवर्तित नहीं करते हैं , स्टाइकियोमेट्रिक दोष कहलाते हैं ।
इन दोषों के कारण अवयवी तत्व रससमीकरणमितिय अनुपात में पाए जाते हैं अर्थात त्रुटि उत्पन्न होने के बाद भी धनायन व ऋणायन का अनुपात वही बना रहता है जो रासायनिक सूत्र में त्रुटि उत्पन्न होने के पूर्व होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को रससमीकरणमितीय क्रिस्टल व इस समीकरण को रससमीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
प्रकार - यह त्रुटि निम्न प्रकार की होती है -
A). रिक्ति दोष
B). अंतराकाशी दोष
C). शॉटकी दोष
D). फ्रेंकेल दोष
A). रिक्ति दोष -
B). अंतराकाशी दोष -
C). शॉटकी दोष - जब किसी आयनिक क्रिस्टल में कुछ धनायन अपने स्थान को छोड़कर क्रिस्टल में से बाहर निकल जाते हैं और क्रिस्टल में रिक्तिकाएं अर्थात् होल बना लेते हैं तब इसे शॉटकी दोष कहते हैं । इस प्रकार के दोष आयनिक क्रिस्टलों में पाए जाते हैं । जिनमें धनायन व ऋणायन का आकार लगभग समान होता है । और उनकी समन्वय संख्या उच्च होती है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है । इस प्रकार की त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
उदाहरण - NaCl , KCl , KBr , CsCl , RbCl , AgBr आदि ।
D). फ्रेंकेल दोष - इस प्रकार का दोष तब उत्पन्न होता है जब कोई धनायन या ऋणायन अपने नियत स्थान से हटकर अंतराकाशी स्थान में जाकर फिट हो जाता है । परिणाम स्वरूप उसके नियत स्थान पर एक छिद्र अर्थात होल बन जाता है । यह दोष ऐसे यौगिकों के क्रिस्टलों में पाए जाते हैं जिनमें आयनो की समन्वय संख्या निम्न होती है तथा धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में बहुत कम होता है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है । इस प्रकार की त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
जैसे - ZnS , AgCl , AgBr , AgI , ZnO आदि ।
नोट - AgBr , शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि दोनों प्रदर्शित करता है ।
प्रश्न - शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि में अंतर लिखिए ।
उत्तर - शॉटकी त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ।
2. इसमें धनायन एवं ऋण आयन का आकार लगभग समान होता है ।
3. इस त्रुटि में धनायन व ऋणायन क्रिस्टल से बाहर निकल जाते हैं ।
4. यह त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या अधिक होती है।
फ्रैंकेल त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है।
2. इसमें धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में छोटा होता है।
3. इस त्रुटि में धनायन क्रिस्टल के अंतराकाशी स्थानों में आ जाते हैं ।
4. यह त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या निम्न होती है ।
प्रश्न - सिल्वर क्लोराइड (AgBr) फ्रेंकल दोष प्रकट करता है , जबकि सोडियम क्लोराइड(NaCl) नहीं क्यों ? कारण स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
क्षारीय धातुओं के हैलाइडों में फ्रैंकल दोष नहीं पाया जाता है , क्यों ?
उत्तर - सोडियम क्लोराइड(NaCl) या क्षारीय धातु के हैलाइड फ्रेंकल दोष प्रकट नहीं करते हैं , क्योंकि सोडियम आयन या क्षारीय धातु आयन का आकार इतना बड़ा होता है कि वह अंतराकाशी रिक्तियों में प्रवेश नहीं कर पाता है ।
जबकि AgBr में सिल्वर आयन का आकार छोटा होता है इसलिए यह अंतरकाशीय रिक्तियों में प्रवेश कर जाता है और फ्रेंकल दोष प्रकट करने लगता है ।
प्रश्न - अरससमीकरणमितीय त्रुटि किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती हैं , समझाइए ।
उत्तर - अरससमीकरणमितीय त्रुटि (Non- Stichiometric defects) - जब किसी क्रिस्टल में त्रुटि उत्पन्न होने के बाद धनायन व ऋणायन का अनुपात उसके रासायनिक सूत्र में प्रदर्शित अनुपात से भिन्न होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को अरस समीकरणमितीय क्रिस्टल कहते हैं । तथा इस त्रुटि को अरस समीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
उदाहरण - FeO , FeS , CuS , CuO , NiO , TiO आदि ।
यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
1. धनायन कि अधिकता (धातु आधिक्य)
2. ऋणायन की अधिकता (अधातु आधिक्य)
A. धातु आयन की अधिकता - यह त्रुटि नििम्न दो प्रकार से उत्पन्न होती है -
अ). ताप के प्रभाव से
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से
अ). ताप के प्रभाव से - जब किसी आयनिक क्रिस्टल जैसे - सोडियम क्लोराइड को गर्म करते हैं तब क्रिस्टल में उपस्थित कुछ ऋण आयन अपने नियत स्थान पर इलेक्ट्रॉन छोड़कर बाहर निकल जाते हैं जिससे इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस क्षेत्र को F - केंद्र कहते हैं । यह क्रिस्टल के रंग को निर्धारित करता है । इस F - केन्द्र के कारण NaCl क्रिस्टल पीले भूरे रंग का होता है । और इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण क्रिस्टल विद्युत उदासीन बना रहता है किंतु क्रिस्टल में धातु आयन (धनायन) की संख्या अधिक एवं अधातु आयन (ऋणायन) की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से - जब किसी क्रिस्टल जालक में अतिरिक्त धनायन अंतराकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाता है । तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ इलेक्ट्रॉन भी अंतरकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाते हैं । इसलिए क्रिस्टल में धनायन की संख्या अधिक व ऋणायन की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
जैसे - जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल में ।
B. अधातु आयन की अधिकता - इस प्रकार की त्रुटि संक्रमण तत्वों से बने क्रिस्टल में होती है क्योंकि इनमें परिवर्ति ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति होती है । क्रिस्टल के निर्माण के समय जब कोई धनायन अपने नियत स्थान पर प्रवेश नहीं कर पाता है तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ धनायन इलेक्ट्रॉन खोकर कुछ ऑक्सीकरण अवस्था में चले जाते हैं । जिससे क्रिस्टल में धनायन की संख्या कम व ऋणायन की संख्या अधिक हो जाती है अर्थात अधातु आयन की अधिकता होती है ।
जैसे - आयरन ऑक्साइड (FeO) क्रिस्टल में ।
प्रश्न - अशुद्धि दोष से आप क्या समझते हो ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अशुद्धि दोष - जब जालक में किसी वह पदार्थ अर्थात अशुद्धि की उपस्थिति होने से दोष उत्पन्न होता है तो उसे अशुद्ध दोष कहते हैं तथा इस क्रिया को डोपिंग कहते हैं । जिससे विद्युत चालकता में वृद्धि होती है और उसके गुणों विशेषतः चालकता गुणों में परिवर्तन आ जाता है ।
अशुद्धियों की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार की रासायनिक अशुद्धियां होती हैं -
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि
B. आयनों की अशुद्धि
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि - जब गलित अवस्था में किसी धात्विक क्रिस्टल में बाहर से अन्य तत्व के परमाणु अशुद्धि के रूप में डाले जाते हैं तब अशुद्धि के परमाणु क्रिस्टल के अंतराकाशी रिक्ति में आ जाते हैं या क्रिस्टल के मूल परमाणु को विस्थापित करके ठोस विलयन बनाते हैं ।
Ge तथा Si के के क्रिस्टल अशुद्धि दोष प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इनकी चालकता बढ़ जाती है ।
उदाहरण - जब समूह 14 के तत्वों में समूह 13 या समूह 15 के तत्व अशुद्धि के रूप में मिलाए जाते हैं तब इनकी चालकता बढ़ जाती है और यह धातु अर्द्ध चालक हो जाते हैं ।
B. आयनों की अशुद्धि - आयनिक ठोस में आयनों की अशुद्धि के मिला देने पर भी अशुद्धि दोष उत्पन्न हो जाते हैं ।
प्रश्न - डोपिंग किसे कहते हैं ।
उत्तर - डोपिंग - किसी शुद्ध पदार्थ में अशुद्धि की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर उसके गुणों में परिवर्तन करने की प्रक्रिया डोपिंग कहलाती है ।
इस प्रक्रिया द्वारा n व p - प्रकार के अर्धचालक बनाए जाते हैं और इन अर्ध चालकों का उपयोग ट्रांजिस्टर , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - F - केन्द्र किसे कहते हैं ? किसी क्रिस्टल पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर - F - केन्द्र - जब किसी कस्टल को गर्म किया जाता है तब उसमें से ऋणायन परमाणु के रूप में बाहर निकल जाता है , तब इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र बनते हैं , जिसे F - केंद्र कहते हैं ।
F - केंद्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश से एक निश्चित ऊर्जा वाले विकिरण का अवशोषण करते हैं और शेष प्रकाश को परिवर्तित करते हैं । इस परावर्तित प्रकाश के कारण क्रिस्टल रंगीन दिखाई देता है ।
जैसे - NaCl क्रिस्टल पीला , LiCl - गुलाबी , KCl बैगनी , ZnO - पीले रंग का होता है ।
प्रश्न - अर्द्ध चालक किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अर्धचालक -(Simeconductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता धातुओं एवं अधातुओं के मध्य होती है , अर्द्ध चालक कहलाते हैं । इनकी चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
प्रकार - अर्द्ध चालक निम्न दो प्रकार के होते है -
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप)
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप)
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 15 के तत्वों (P या As) को मिलाया जाता है तब n - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता ऋण आवेशित अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होती है ।
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 13 के तत्वों (B , Al या Ga) को मिलाया जाता है तब p - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता धन आवेशित अतिरिक्त छिद्रों की गति के कारण होती है ।
अर्धचालकों के उपयोग - अर्धचालक को संयुक्त करके डायोड बनाए जाते हैं जिनका उपयोग रेडियो , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - समूह 14 के तत्व को n - प्रकार के अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपांतरित करना है । यह अशुद्धि किस वर्ग से संबंधित होनी चाहिए ।
उत्तर - n - प्रकार के अर्धचालक वे होते हैं जिनकी चालकता में वृद्धि इलेक्ट्रॉनों के आधिक्य के कारण हुई है या की गई है ।
Si या Ge चौदहवें समूह के तत्व हैं और प्रत्येक में 4 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं इनके क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटतम परमाणुओं के साथ 4 सहसंयोजक बंध बनाता है ।
जब 15वें समूह के तत्व जैसे P या As , जिनमें अनेक जिनमें पांच संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं , को इसके साथ अपमिश्रित किया जाता है , तब यह Si या Ge के कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं ।
पांच में से चार इलेक्ट्रॉन Si परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध बनाने में प्रयुक्त हो जाते हैं और पांचवा अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थापित हो जाता है यह विस्थापित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित Si या Ge की चालकता में वृद्धि कर देता है । यहां चालकता
प्रश्न - अष्टफलकीय एवं चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण लिखिए ।
उत्तर - चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या से दुगनी होती है ।
2. प्रत्येक गोले से दो चतुष्फलकीय रिक्तियां संबंध रहती हैं ।
3. चतुष्फलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.225 गुना होता है ।
4. चतुष्फलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 4 होती है
अष्टफलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या के बराबर होती है ।
2. प्रत्येक गोले से एक अष्टफलकीय रिक्ति संबंध रहती हैं ।
3. अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.414 गुना होता है ।
4. अष्टफलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 6 होती है
नोट - अष्टफलकीय रिक्तियां चतुष्फलकीय रिक्तियों से बड़ी होती हैं ।
प्रश्न - NaCl एवं CsCl क्रिस्टल की सरंचना समझाइए ।
उत्तर - NaCl की रॉक साल्ट सरंचना - सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना FCC या CCP प्रकार की होती है । जिसमें सोडियम आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहती है । इसमें सोडियम आयन अपने चारों ओर 6 क्लोरीन आयनों से एवं प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 6 सोडियम आयनों से घिरा रहता है । इसलिए सोडियम क्लोराइड (NaCl) की समन्वय संख्या 6:6 होती है । FCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल में परमाणुओं की संख्या चार होती है ।
चित्र - नीचे चित्र में NaCl की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें सोडियम आयन को खाली गोले तथा क्लोरीन आयन को ठोस गोले से प्रदर्शित किया गया है -
नोट - NaCl के समान लिथियम व रूबेडियम के हैलाइड , बेरिलियम व स्ट्रांशियम के ऑक्साइड एवं सल्फाइड की संरचना भी होती है।
(2). CsCl की सरंचना - CsCl क्रिस्टल की संरचना BCC प्रकार की होती है जिसमें सीजियम आयन व क्लोरीन आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहते हैं । इसमें Cs आयन व Cl आयन अपने नियमित व्यवस्था में जुड़े रहते हैं । जिसमें प्रत्येक Cs आयन अपने चारों ओर 8 क्लोरीन आयनों से घिरा रहता है तथा प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 8 Cs आयनों से घिरा रहता है तथा इसलिए CsCl की समन्वय संख्या 8:8 होती है।
इसमें Cs आयन घन के कोने पर Cl आयन घन के केंद्र में स्थित रहते हैं या फिर इसके ठीक विपरीत व्यवस्था होती है ।
[ ] BCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 2 होनी चाहिए किंतु Cs आयन के बड़े आकार के कारण सरंचना विकृत होती है । जिससे प्रति यूनिट परमाणुओं की संख्या 1 होती है ।
[ ] CsCl की संरचना को नीचे चित्र में प्रदर्शित किया गया है जिसमें Cs आयन को खाली गोले एवं क्लोरीन आयन को ठोस गोले से दर्शाया गया है।
नोट - CsCl सरंचना के समान CsBr , CsI , TlCl , TlBr आदि क्रिस्टलों की संरचना भी होती है ।
(3). ZnS की सरंचना - ZnS की सरंचना FCC या CCP प्रकार की होती है जिसमे Zn आयन अष्टफलकीय रिक्ति में तथा सल्फाइड आयन चतुष्फलकीय रिक्ति में व्यवस्थित रहते हैं । इसमें प्रत्येक Zn आयन अपने चारों ओर 4 सल्फाइड आयनों से एवं प्रत्येक सल्फाइड आयन अपने चारों ओर 4 Zn आयनों से घिरा रहता है । इसलिए जिंक सल्फाइड की समन्वय संख्या 4:4 होती है । FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं का योगदान 4 होता है ।
चित्र - नीचे चित्र में जिंक सल्फेट की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें Zn आयनों को खाली गोले एवं सल्फाइड आयनों को ठोस गोले से दर्शाया गया है -
नोट - ZnS के समान CuCl , CuBr , HgS आदि की क्रिस्टलों की सरंचना भी होती है ।
प्रश्न - CaF2 की फ्लोराइट सरंचना एवं Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना को समझाइए ।
उत्तर - 1). CaF2 की फ्लोराइट सरंचना - CaF2 की फ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक कैल्शियम आयन अपने चारों ओर 8 फ्लोराइड आयनों से एवं प्रत्येक फ्लोरीन आयन अपने चारों ओर 4 कैल्शियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे कैल्शियम फ्लोराइड की समन्वय संख्या 8:4 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की संरचना SrF2 , BaF2 , CdF2 आदि क्रिस्टलों एवं लैंथेनाइड और एक्टिनाइड के ऑक्साइड में भी होती है ।
2). Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना - Na2O की एंटीफ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक सोडियम आयन अपने चारों ओर 4 , ऑक्सीजन आयनों से एवं प्रत्येक ऑक्सीजन आयन अपने चारों ओर 8 , सोडियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे Na2O की समन्वय संख्या 4:8 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की सरंचना Li2O , K2O , K2S आदि क्रिस्टलों की भी होती है ।
3). स्पाइनल सरंचना - खनिज MgAlO4 को स्पाइनल कहते हैं । इस प्रकार की संरचना AB2O4 प्रकार के अणुओं की भी होती है ।
जैसे - फेराइट्स(ZnFe2O4)
इसमें A2+ आयन चतुष्फलकीय की रिक्ति में , B3+ आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहता है । इसमें अवयवी कण FCC व्यवस्था में व्यवस्थित रहते हैं । इसलिए प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं ? इसका महत्त्व लिखिए ।
उत्तर - त्रिज्या अनुपात - किसी आयनिक क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते हैं ।
माना किसी क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या r+ एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या r- है । तब -
त्रिज्या अनुपात = r+/r-
महत्व - त्रिज्या अनुपात द्वारा क्रिस्टल की समन्वय संख्या व संरचनात्मक व्यवस्था स्पष्ट होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात एवं समन्वय संख्या में संबंध लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - एक क्रिस्टल में A+ की त्रिज्या 60 pm तथा B की त्रिज्या 136 pm है , तब इस क्रिस्टल की संरचना एवं समन्वय संख्या बताइए ।
हल - दिया है - धनायन की आयनिक त्रिज्या = 60 pm
ऋणायन की आयनिक त्रिज्या = 136 pm
सरंचना व समन्वय संख्या = ?
सूत्र - त्रिज्या अनुपात = r+/r-
सूत्र में मान रखने पर -
= 60/136
= 0.441
चूंकि त्रिज्या अनुपात का मान 0.441 है अतः क्रिस्टल की सरंचना अष्टफलकीय व समन्वय संख्या 6 होगी ।
प्रश्न - एक क्रिस्टल AB में A+ की त्रिज्या 95 pm तथा B- की त्रिज्या 181 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - एक क्रिस्टल XY में X+ की त्रिज्या 181 pm तथा Y- की त्रिज्या 235 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - ब्रैग समीकरण लिखिए ।
उत्तर - ब्रैग समीकरण - लॉरेंस ब्रैग क्रिस्टलों के तलों के बीच की दूरी ज्ञात करने के लिए एक समीकरण प्रस्तुत किया , जिसे ब्रैग समीकरण कहते हैं ।
यह समीकरण निम्न है -
यहाँ -
n = सतहों की संख्या
d = दो सतहों के बीच की दूरी
लैम्डा = किरणों का तरंगधैर्य
थीटा = आपतन कोण
प्रश्न - ठोसों में अपूर्णता या त्रुटि से आप क्या समझते हो ? यह किन कारणों से उत्पन्न होती हैं ?
उत्तर - अपूर्णता या त्रुटि (Defects) - किसी क्रिस्टल में अभी-अभी कणों की अव्यवस्था या अशुद्धि के प्रवेश से जो कमी उत्पन्न होती है उसे अपूर्णता या त्रुटि कहते हैं ।
क्रिस्टलों में त्रुटि निम्न तीन कारणों से उत्पन्न होती है -
1. ताप के कारण 2. अशुद्धि के कारण 3. क्रिस्टलीकरण के कारण
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस में अपूर्णताओं को कितने प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है ?
उत्तर -
प्रश्न - बिंदु दोष किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बिंदु दोष (Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं यह आयनों की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को , बिंदु दोष या बिंदु त्रुटि कहते हैं ।
बिंदु दोष के प्रकार - बिंदु दोष निम्न तीन प्रकार के होते हैं -
1. रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
2. अरस समीकरण मितीय त्रुटि (Non stichiometric defects)
3. अशुद्धता त्रुटि (Impurity defects)
वर्गीकरण - क्रिस्टल में त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती हैं -
1. इलेक्ट्रॉनिक त्रुटि (Electronic defects) - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ). n- प्रकार के अर्धचालक
ब). p- प्रकार के अर्धचालक
2. बिंदु त्रुटि(Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं या आयनो की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को बिंदु त्रुटि कहते हैं । यह त्रुटि धनायनों या ऋणायनों के अपने उचित स्थान से विचलित होने के कारण उत्पन्न होते हैं ।
यह त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती है -
अ). रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
ब). अरस समीकरणमितीय त्रुटि (Non-Stichiometric defects)
स). अशुद्धि त्रुटि (Impurity defects)
3. परमाण्विक त्रुटि - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ).
ब).
प्रश्न - रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) किसे कहते हैं ? इसके प्रकारों को समझाइए ?
उत्तर - रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) - वे दोष जो यौगिक की स्टाइकियोमैट्री को परिवर्तित नहीं करते हैं , स्टाइकियोमेट्रिक दोष कहलाते हैं ।
इन दोषों के कारण अवयवी तत्व रससमीकरणमितिय अनुपात में पाए जाते हैं अर्थात त्रुटि उत्पन्न होने के बाद भी धनायन व ऋणायन का अनुपात वही बना रहता है जो रासायनिक सूत्र में त्रुटि उत्पन्न होने के पूर्व होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को रससमीकरणमितीय क्रिस्टल व इस समीकरण को रससमीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
प्रकार - यह त्रुटि निम्न प्रकार की होती है -
A). रिक्ति दोष
B). अंतराकाशी दोष
C). शॉटकी दोष
D). फ्रेंकेल दोष
A). रिक्ति दोष -
B). अंतराकाशी दोष -
C). शॉटकी दोष - जब किसी आयनिक क्रिस्टल में कुछ धनायन अपने स्थान को छोड़कर क्रिस्टल में से बाहर निकल जाते हैं और क्रिस्टल में रिक्तिकाएं अर्थात् होल बना लेते हैं तब इसे शॉटकी दोष कहते हैं । इस प्रकार के दोष आयनिक क्रिस्टलों में पाए जाते हैं । जिनमें धनायन व ऋणायन का आकार लगभग समान होता है । और उनकी समन्वय संख्या उच्च होती है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है । इस प्रकार की त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
उदाहरण - NaCl , KCl , KBr , CsCl , RbCl , AgBr आदि ।
D). फ्रेंकेल दोष - इस प्रकार का दोष तब उत्पन्न होता है जब कोई धनायन या ऋणायन अपने नियत स्थान से हटकर अंतराकाशी स्थान में जाकर फिट हो जाता है । परिणाम स्वरूप उसके नियत स्थान पर एक छिद्र अर्थात होल बन जाता है । यह दोष ऐसे यौगिकों के क्रिस्टलों में पाए जाते हैं जिनमें आयनो की समन्वय संख्या निम्न होती है तथा धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में बहुत कम होता है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है । इस प्रकार की त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
जैसे - ZnS , AgCl , AgBr , AgI , ZnO आदि ।
नोट - AgBr , शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि दोनों प्रदर्शित करता है ।
प्रश्न - शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि में अंतर लिखिए ।
उत्तर - शॉटकी त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ।
2. इसमें धनायन एवं ऋण आयन का आकार लगभग समान होता है ।
3. इस त्रुटि में धनायन व ऋणायन क्रिस्टल से बाहर निकल जाते हैं ।
4. यह त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या अधिक होती है।
फ्रैंकेल त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है।
2. इसमें धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में छोटा होता है।
3. इस त्रुटि में धनायन क्रिस्टल के अंतराकाशी स्थानों में आ जाते हैं ।
4. यह त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या निम्न होती है ।
प्रश्न - सिल्वर क्लोराइड (AgBr) फ्रेंकल दोष प्रकट करता है , जबकि सोडियम क्लोराइड(NaCl) नहीं क्यों ? कारण स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
क्षारीय धातुओं के हैलाइडों में फ्रैंकल दोष नहीं पाया जाता है , क्यों ?
उत्तर - सोडियम क्लोराइड(NaCl) या क्षारीय धातु के हैलाइड फ्रेंकल दोष प्रकट नहीं करते हैं , क्योंकि सोडियम आयन या क्षारीय धातु आयन का आकार इतना बड़ा होता है कि वह अंतराकाशी रिक्तियों में प्रवेश नहीं कर पाता है ।
जबकि AgBr में सिल्वर आयन का आकार छोटा होता है इसलिए यह अंतरकाशीय रिक्तियों में प्रवेश कर जाता है और फ्रेंकल दोष प्रकट करने लगता है ।
प्रश्न - अरससमीकरणमितीय त्रुटि किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती हैं , समझाइए ।
उत्तर - अरससमीकरणमितीय त्रुटि (Non- Stichiometric defects) - जब किसी क्रिस्टल में त्रुटि उत्पन्न होने के बाद धनायन व ऋणायन का अनुपात उसके रासायनिक सूत्र में प्रदर्शित अनुपात से भिन्न होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को अरस समीकरणमितीय क्रिस्टल कहते हैं । तथा इस त्रुटि को अरस समीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
उदाहरण - FeO , FeS , CuS , CuO , NiO , TiO आदि ।
यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
1. धनायन कि अधिकता (धातु आधिक्य)
2. ऋणायन की अधिकता (अधातु आधिक्य)
A. धातु आयन की अधिकता - यह त्रुटि नििम्न दो प्रकार से उत्पन्न होती है -
अ). ताप के प्रभाव से
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से
अ). ताप के प्रभाव से - जब किसी आयनिक क्रिस्टल जैसे - सोडियम क्लोराइड को गर्म करते हैं तब क्रिस्टल में उपस्थित कुछ ऋण आयन अपने नियत स्थान पर इलेक्ट्रॉन छोड़कर बाहर निकल जाते हैं जिससे इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस क्षेत्र को F - केंद्र कहते हैं । यह क्रिस्टल के रंग को निर्धारित करता है । इस F - केन्द्र के कारण NaCl क्रिस्टल पीले भूरे रंग का होता है । और इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण क्रिस्टल विद्युत उदासीन बना रहता है किंतु क्रिस्टल में धातु आयन (धनायन) की संख्या अधिक एवं अधातु आयन (ऋणायन) की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से - जब किसी क्रिस्टल जालक में अतिरिक्त धनायन अंतराकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाता है । तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ इलेक्ट्रॉन भी अंतरकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाते हैं । इसलिए क्रिस्टल में धनायन की संख्या अधिक व ऋणायन की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
जैसे - जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल में ।
B. अधातु आयन की अधिकता - इस प्रकार की त्रुटि संक्रमण तत्वों से बने क्रिस्टल में होती है क्योंकि इनमें परिवर्ति ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति होती है । क्रिस्टल के निर्माण के समय जब कोई धनायन अपने नियत स्थान पर प्रवेश नहीं कर पाता है तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ धनायन इलेक्ट्रॉन खोकर कुछ ऑक्सीकरण अवस्था में चले जाते हैं । जिससे क्रिस्टल में धनायन की संख्या कम व ऋणायन की संख्या अधिक हो जाती है अर्थात अधातु आयन की अधिकता होती है ।
जैसे - आयरन ऑक्साइड (FeO) क्रिस्टल में ।
प्रश्न - अशुद्धि दोष से आप क्या समझते हो ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अशुद्धि दोष - जब जालक में किसी वह पदार्थ अर्थात अशुद्धि की उपस्थिति होने से दोष उत्पन्न होता है तो उसे अशुद्ध दोष कहते हैं तथा इस क्रिया को डोपिंग कहते हैं । जिससे विद्युत चालकता में वृद्धि होती है और उसके गुणों विशेषतः चालकता गुणों में परिवर्तन आ जाता है ।
अशुद्धियों की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार की रासायनिक अशुद्धियां होती हैं -
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि
B. आयनों की अशुद्धि
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि - जब गलित अवस्था में किसी धात्विक क्रिस्टल में बाहर से अन्य तत्व के परमाणु अशुद्धि के रूप में डाले जाते हैं तब अशुद्धि के परमाणु क्रिस्टल के अंतराकाशी रिक्ति में आ जाते हैं या क्रिस्टल के मूल परमाणु को विस्थापित करके ठोस विलयन बनाते हैं ।
Ge तथा Si के के क्रिस्टल अशुद्धि दोष प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इनकी चालकता बढ़ जाती है ।
उदाहरण - जब समूह 14 के तत्वों में समूह 13 या समूह 15 के तत्व अशुद्धि के रूप में मिलाए जाते हैं तब इनकी चालकता बढ़ जाती है और यह धातु अर्द्ध चालक हो जाते हैं ।
B. आयनों की अशुद्धि - आयनिक ठोस में आयनों की अशुद्धि के मिला देने पर भी अशुद्धि दोष उत्पन्न हो जाते हैं ।
प्रश्न - डोपिंग किसे कहते हैं ।
उत्तर - डोपिंग - किसी शुद्ध पदार्थ में अशुद्धि की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर उसके गुणों में परिवर्तन करने की प्रक्रिया डोपिंग कहलाती है ।
इस प्रक्रिया द्वारा n व p - प्रकार के अर्धचालक बनाए जाते हैं और इन अर्ध चालकों का उपयोग ट्रांजिस्टर , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - F - केन्द्र किसे कहते हैं ? किसी क्रिस्टल पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर - F - केन्द्र - जब किसी कस्टल को गर्म किया जाता है तब उसमें से ऋणायन परमाणु के रूप में बाहर निकल जाता है , तब इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र बनते हैं , जिसे F - केंद्र कहते हैं ।
F - केंद्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश से एक निश्चित ऊर्जा वाले विकिरण का अवशोषण करते हैं और शेष प्रकाश को परिवर्तित करते हैं । इस परावर्तित प्रकाश के कारण क्रिस्टल रंगीन दिखाई देता है ।
जैसे - NaCl क्रिस्टल पीला , LiCl - गुलाबी , KCl बैगनी , ZnO - पीले रंग का होता है ।
प्रश्न - अर्द्ध चालक किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अर्धचालक -(Simeconductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता धातुओं एवं अधातुओं के मध्य होती है , अर्द्ध चालक कहलाते हैं । इनकी चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
प्रकार - अर्द्ध चालक निम्न दो प्रकार के होते है -
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप)
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप)
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 15 के तत्वों (P या As) को मिलाया जाता है तब n - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता ऋण आवेशित अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होती है ।
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 13 के तत्वों (B , Al या Ga) को मिलाया जाता है तब p - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता धन आवेशित अतिरिक्त छिद्रों की गति के कारण होती है ।
अर्धचालकों के उपयोग - अर्धचालक को संयुक्त करके डायोड बनाए जाते हैं जिनका उपयोग रेडियो , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - समूह 14 के तत्व को n - प्रकार के अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपांतरित करना है । यह अशुद्धि किस वर्ग से संबंधित होनी चाहिए ।
उत्तर - n - प्रकार के अर्धचालक वे होते हैं जिनकी चालकता में वृद्धि इलेक्ट्रॉनों के आधिक्य के कारण हुई है या की गई है ।
Si या Ge चौदहवें समूह के तत्व हैं और प्रत्येक में 4 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं इनके क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटतम परमाणुओं के साथ 4 सहसंयोजक बंध बनाता है ।
जब 15वें समूह के तत्व जैसे P या As , जिनमें अनेक जिनमें पांच संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं , को इसके साथ अपमिश्रित किया जाता है , तब यह Si या Ge के कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं ।
पांच में से चार इलेक्ट्रॉन Si परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध बनाने में प्रयुक्त हो जाते हैं और पांचवा अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थापित हो जाता है यह विस्थापित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित Si या Ge की चालकता में वृद्धि कर देता है । यहां चालकता वृद्धि इलेक्ट्रॉन के कारण होती है अतः इलेक्ट्रॉन धनी अशुद्धि से युक्त Si या Ge को n - प्रकार का अर्धचालक कहा जाता है ।
उत्तर - चतुष्फलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या से दुगनी होती है ।
2. प्रत्येक गोले से दो चतुष्फलकीय रिक्तियां संबंध रहती हैं ।
3. चतुष्फलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.225 गुना होता है ।
4. चतुष्फलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 4 होती है
अष्टफलकीय रिक्तियों के लक्षण -
1. बंद संकुलित संरचना में अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या गोलों की संख्या के बराबर होती है ।
2. प्रत्येक गोले से एक अष्टफलकीय रिक्ति संबंध रहती हैं ।
3. अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या का आकार गोले की त्रिज्या के आकार का 0.414 गुना होता है ।
4. अष्टफलकीय की रिक्ति की समन्वय संख्या 6 होती है
नोट - अष्टफलकीय रिक्तियां चतुष्फलकीय रिक्तियों से बड़ी होती हैं ।
प्रश्न - NaCl एवं CsCl क्रिस्टल की सरंचना समझाइए ।
उत्तर - NaCl की रॉक साल्ट सरंचना - सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना FCC या CCP प्रकार की होती है । जिसमें सोडियम आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहती है । इसमें सोडियम आयन अपने चारों ओर 6 क्लोरीन आयनों से एवं प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 6 सोडियम आयनों से घिरा रहता है । इसलिए सोडियम क्लोराइड (NaCl) की समन्वय संख्या 6:6 होती है । FCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल में परमाणुओं की संख्या चार होती है ।
चित्र - नीचे चित्र में NaCl की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें सोडियम आयन को खाली गोले तथा क्लोरीन आयन को ठोस गोले से प्रदर्शित किया गया है -
नोट - NaCl के समान लिथियम व रूबेडियम के हैलाइड , बेरिलियम व स्ट्रांशियम के ऑक्साइड एवं सल्फाइड की संरचना भी होती है।
(2). CsCl की सरंचना - CsCl क्रिस्टल की संरचना BCC प्रकार की होती है जिसमें सीजियम आयन व क्लोरीन आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहते हैं । इसमें Cs आयन व Cl आयन अपने नियमित व्यवस्था में जुड़े रहते हैं । जिसमें प्रत्येक Cs आयन अपने चारों ओर 8 क्लोरीन आयनों से घिरा रहता है तथा प्रत्येक क्लोरीन आयन अपने चारों ओर 8 Cs आयनों से घिरा रहता है तथा इसलिए CsCl की समन्वय संख्या 8:8 होती है।
इसमें Cs आयन घन के कोने पर Cl आयन घन के केंद्र में स्थित रहते हैं या फिर इसके ठीक विपरीत व्यवस्था होती है ।
[ ] BCC संरचना के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 2 होनी चाहिए किंतु Cs आयन के बड़े आकार के कारण सरंचना विकृत होती है । जिससे प्रति यूनिट परमाणुओं की संख्या 1 होती है ।
[ ] CsCl की संरचना को नीचे चित्र में प्रदर्शित किया गया है जिसमें Cs आयन को खाली गोले एवं क्लोरीन आयन को ठोस गोले से दर्शाया गया है।
नोट - CsCl सरंचना के समान CsBr , CsI , TlCl , TlBr आदि क्रिस्टलों की संरचना भी होती है ।
(3). ZnS की सरंचना - ZnS की सरंचना FCC या CCP प्रकार की होती है जिसमे Zn आयन अष्टफलकीय रिक्ति में तथा सल्फाइड आयन चतुष्फलकीय रिक्ति में व्यवस्थित रहते हैं । इसमें प्रत्येक Zn आयन अपने चारों ओर 4 सल्फाइड आयनों से एवं प्रत्येक सल्फाइड आयन अपने चारों ओर 4 Zn आयनों से घिरा रहता है । इसलिए जिंक सल्फाइड की समन्वय संख्या 4:4 होती है । FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं का योगदान 4 होता है ।
चित्र - नीचे चित्र में जिंक सल्फेट की संरचना प्रदर्शित की गई है जिसमें Zn आयनों को खाली गोले एवं सल्फाइड आयनों को ठोस गोले से दर्शाया गया है -
नोट - ZnS के समान CuCl , CuBr , HgS आदि की क्रिस्टलों की सरंचना भी होती है ।
प्रश्न - CaF2 की फ्लोराइट सरंचना एवं Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना को समझाइए ।
उत्तर - 1). CaF2 की फ्लोराइट सरंचना - CaF2 की फ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक कैल्शियम आयन अपने चारों ओर 8 फ्लोराइड आयनों से एवं प्रत्येक फ्लोरीन आयन अपने चारों ओर 4 कैल्शियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे कैल्शियम फ्लोराइड की समन्वय संख्या 8:4 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की संरचना SrF2 , BaF2 , CdF2 आदि क्रिस्टलों एवं लैंथेनाइड और एक्टिनाइड के ऑक्साइड में भी होती है ।
2). Na2O की एंटी फ्लोराइट सरंचना - Na2O की एंटीफ्लोराइट संरचना होती है । इसमें प्रत्येक सोडियम आयन अपने चारों ओर 4 , ऑक्सीजन आयनों से एवं प्रत्येक ऑक्सीजन आयन अपने चारों ओर 8 , सोडियम आयनों से घिरा रहता है । जिससे Na2O की समन्वय संख्या 4:8 होती है । इसमें FCC संरचना होने के कारण प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
इस प्रकार की सरंचना Li2O , K2O , K2S आदि क्रिस्टलों की भी होती है ।
3). स्पाइनल सरंचना - खनिज MgAlO4 को स्पाइनल कहते हैं । इस प्रकार की संरचना AB2O4 प्रकार के अणुओं की भी होती है ।
जैसे - फेराइट्स(ZnFe2O4)
इसमें A2+ आयन चतुष्फलकीय की रिक्ति में , B3+ आयन अष्टफलकीय रिक्ति में उपस्थित रहता है । इसमें अवयवी कण FCC व्यवस्था में व्यवस्थित रहते हैं । इसलिए प्रति यूनिट सेल परमाणुओं की संख्या 4 होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं ? इसका महत्त्व लिखिए ।
उत्तर - त्रिज्या अनुपात - किसी आयनिक क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते हैं ।
माना किसी क्रिस्टल में धनायन की आयनिक त्रिज्या r+ एवं ऋणायन की आयनिक त्रिज्या r- है । तब -
त्रिज्या अनुपात = r+/r-
महत्व - त्रिज्या अनुपात द्वारा क्रिस्टल की समन्वय संख्या व संरचनात्मक व्यवस्था स्पष्ट होती है ।
प्रश्न - त्रिज्या अनुपात एवं समन्वय संख्या में संबंध लिखिए ।
उत्तर -
प्रश्न - एक क्रिस्टल में A+ की त्रिज्या 60 pm तथा B की त्रिज्या 136 pm है , तब इस क्रिस्टल की संरचना एवं समन्वय संख्या बताइए ।
हल - दिया है - धनायन की आयनिक त्रिज्या = 60 pm
ऋणायन की आयनिक त्रिज्या = 136 pm
सरंचना व समन्वय संख्या = ?
सूत्र - त्रिज्या अनुपात = r+/r-
सूत्र में मान रखने पर -
= 60/136
= 0.441
चूंकि त्रिज्या अनुपात का मान 0.441 है अतः क्रिस्टल की सरंचना अष्टफलकीय व समन्वय संख्या 6 होगी ।
प्रश्न - एक क्रिस्टल AB में A+ की त्रिज्या 95 pm तथा B- की त्रिज्या 181 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - एक क्रिस्टल XY में X+ की त्रिज्या 181 pm तथा Y- की त्रिज्या 235 pm है । तब क्रिस्टल की सरंचना एवं समन्वय संख्या ज्ञात करो ।
हल -
प्रश्न - ब्रैग समीकरण लिखिए ।
उत्तर - ब्रैग समीकरण - लॉरेंस ब्रैग क्रिस्टलों के तलों के बीच की दूरी ज्ञात करने के लिए एक समीकरण प्रस्तुत किया , जिसे ब्रैग समीकरण कहते हैं ।
यह समीकरण निम्न है -
यहाँ -
n = सतहों की संख्या
d = दो सतहों के बीच की दूरी
लैम्डा = किरणों का तरंगधैर्य
थीटा = आपतन कोण
प्रश्न - ठोसों में अपूर्णता या त्रुटि से आप क्या समझते हो ? यह किन कारणों से उत्पन्न होती हैं ?
उत्तर - अपूर्णता या त्रुटि (Defects) - किसी क्रिस्टल में अभी-अभी कणों की अव्यवस्था या अशुद्धि के प्रवेश से जो कमी उत्पन्न होती है उसे अपूर्णता या त्रुटि कहते हैं ।
क्रिस्टलों में त्रुटि निम्न तीन कारणों से उत्पन्न होती है -
1. ताप के कारण 2. अशुद्धि के कारण 3. क्रिस्टलीकरण के कारण
प्रश्न - क्रिस्टलीय ठोस में अपूर्णताओं को कितने प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है ?
उत्तर -
प्रश्न - बिंदु दोष किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बिंदु दोष (Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं यह आयनों की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को , बिंदु दोष या बिंदु त्रुटि कहते हैं ।
बिंदु दोष के प्रकार - बिंदु दोष निम्न तीन प्रकार के होते हैं -
1. रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
2. अरस समीकरण मितीय त्रुटि (Non stichiometric defects)
3. अशुद्धता त्रुटि (Impurity defects)
वर्गीकरण - क्रिस्टल में त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती हैं -
1. इलेक्ट्रॉनिक त्रुटि (Electronic defects) - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ). n- प्रकार के अर्धचालक
ब). p- प्रकार के अर्धचालक
2. बिंदु त्रुटि(Point defects) - किसी क्रिस्टल में परमाणुओं या आयनो की नियमित व्यवस्था में विचलन होने पर उत्पन्न दोष को बिंदु त्रुटि कहते हैं । यह त्रुटि धनायनों या ऋणायनों के अपने उचित स्थान से विचलित होने के कारण उत्पन्न होते हैं ।
यह त्रुटि निम्न तीन प्रकार की होती है -
अ). रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects)
ब). अरस समीकरणमितीय त्रुटि (Non-Stichiometric defects)
स). अशुद्धि त्रुटि (Impurity defects)
3. परमाण्विक त्रुटि - यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
अ).
ब).
प्रश्न - रस समीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) किसे कहते हैं ? इसके प्रकारों को समझाइए ?
उत्तर - रससमीकरणमितीय त्रुटि (Stichiometric defects) - वे दोष जो यौगिक की स्टाइकियोमैट्री को परिवर्तित नहीं करते हैं , स्टाइकियोमेट्रिक दोष कहलाते हैं ।
इन दोषों के कारण अवयवी तत्व रससमीकरणमितिय अनुपात में पाए जाते हैं अर्थात त्रुटि उत्पन्न होने के बाद भी धनायन व ऋणायन का अनुपात वही बना रहता है जो रासायनिक सूत्र में त्रुटि उत्पन्न होने के पूर्व होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को रससमीकरणमितीय क्रिस्टल व इस समीकरण को रससमीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
प्रकार - यह त्रुटि निम्न प्रकार की होती है -
A). रिक्ति दोष
B). अंतराकाशी दोष
C). शॉटकी दोष
D). फ्रेंकेल दोष
A). रिक्ति दोष -
B). अंतराकाशी दोष -
C). शॉटकी दोष - जब किसी आयनिक क्रिस्टल में कुछ धनायन अपने स्थान को छोड़कर क्रिस्टल में से बाहर निकल जाते हैं और क्रिस्टल में रिक्तिकाएं अर्थात् होल बना लेते हैं तब इसे शॉटकी दोष कहते हैं । इस प्रकार के दोष आयनिक क्रिस्टलों में पाए जाते हैं । जिनमें धनायन व ऋणायन का आकार लगभग समान होता है । और उनकी समन्वय संख्या उच्च होती है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है । इस प्रकार की त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
उदाहरण - NaCl , KCl , KBr , CsCl , RbCl , AgBr आदि ।
D). फ्रेंकेल दोष - इस प्रकार का दोष तब उत्पन्न होता है जब कोई धनायन या ऋणायन अपने नियत स्थान से हटकर अंतराकाशी स्थान में जाकर फिट हो जाता है । परिणाम स्वरूप उसके नियत स्थान पर एक छिद्र अर्थात होल बन जाता है । यह दोष ऐसे यौगिकों के क्रिस्टलों में पाए जाते हैं जिनमें आयनो की समन्वय संख्या निम्न होती है तथा धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में बहुत कम होता है । इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है । इस प्रकार की त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
जैसे - ZnS , AgCl , AgBr , AgI , ZnO आदि ।
नोट - AgBr , शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि दोनों प्रदर्शित करता है ।
प्रश्न - शॉटकी त्रुटि एवं फ्रेंकल त्रुटि में अंतर लिखिए ।
उत्तर - शॉटकी त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ।
2. इसमें धनायन एवं ऋण आयन का आकार लगभग समान होता है ।
3. इस त्रुटि में धनायन व ऋणायन क्रिस्टल से बाहर निकल जाते हैं ।
4. यह त्रुटि s-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या अधिक होती है।
फ्रैंकेल त्रुटि -
1. इसमें क्रिस्टल का घनत्व अपरिवर्तित रहता है।
2. इसमें धनायन का आकार ऋणायन की तुलना में छोटा होता है।
3. इस त्रुटि में धनायन क्रिस्टल के अंतराकाशी स्थानों में आ जाते हैं ।
4. यह त्रुटि d-ब्लॉक के तत्व प्रदर्शित करते हैं ।
5. इस त्रुटि में समन्वय संख्या निम्न होती है ।
प्रश्न - सिल्वर क्लोराइड (AgBr) फ्रेंकल दोष प्रकट करता है , जबकि सोडियम क्लोराइड(NaCl) नहीं क्यों ? कारण स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
क्षारीय धातुओं के हैलाइडों में फ्रैंकल दोष नहीं पाया जाता है , क्यों ?
उत्तर - सोडियम क्लोराइड(NaCl) या क्षारीय धातु के हैलाइड फ्रेंकल दोष प्रकट नहीं करते हैं , क्योंकि सोडियम आयन या क्षारीय धातु आयन का आकार इतना बड़ा होता है कि वह अंतराकाशी रिक्तियों में प्रवेश नहीं कर पाता है ।
जबकि AgBr में सिल्वर आयन का आकार छोटा होता है इसलिए यह अंतरकाशीय रिक्तियों में प्रवेश कर जाता है और फ्रेंकल दोष प्रकट करने लगता है ।
प्रश्न - अरससमीकरणमितीय त्रुटि किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती हैं , समझाइए ।
उत्तर - अरससमीकरणमितीय त्रुटि (Non- Stichiometric defects) - जब किसी क्रिस्टल में त्रुटि उत्पन्न होने के बाद धनायन व ऋणायन का अनुपात उसके रासायनिक सूत्र में प्रदर्शित अनुपात से भिन्न होता है , तब ऐसे क्रिस्टल को अरस समीकरणमितीय क्रिस्टल कहते हैं । तथा इस त्रुटि को अरस समीकरणमितीय त्रुटि कहते हैं ।
उदाहरण - FeO , FeS , CuS , CuO , NiO , TiO आदि ।
यह त्रुटि निम्न दो प्रकार की होती है -
1. धनायन कि अधिकता (धातु आधिक्य)
2. ऋणायन की अधिकता (अधातु आधिक्य)
A. धातु आयन की अधिकता - यह त्रुटि नििम्न दो प्रकार से उत्पन्न होती है -
अ). ताप के प्रभाव से
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से
अ). ताप के प्रभाव से - जब किसी आयनिक क्रिस्टल जैसे - सोडियम क्लोराइड को गर्म करते हैं तब क्रिस्टल में उपस्थित कुछ ऋण आयन अपने नियत स्थान पर इलेक्ट्रॉन छोड़कर बाहर निकल जाते हैं जिससे इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस क्षेत्र को F - केंद्र कहते हैं । यह क्रिस्टल के रंग को निर्धारित करता है । इस F - केन्द्र के कारण NaCl क्रिस्टल पीले भूरे रंग का होता है । और इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण क्रिस्टल विद्युत उदासीन बना रहता है किंतु क्रिस्टल में धातु आयन (धनायन) की संख्या अधिक एवं अधातु आयन (ऋणायन) की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
ब). अतिरिक्त धनायन के प्रवेश से - जब किसी क्रिस्टल जालक में अतिरिक्त धनायन अंतराकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाता है । तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ इलेक्ट्रॉन भी अंतरकाशी रिक्ति में प्रवेश कर जाते हैं । इसलिए क्रिस्टल में धनायन की संख्या अधिक व ऋणायन की संख्या कम हो जाती है अर्थात धातु आयन की अधिकता हो जाती है ।
जैसे - जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल में ।
B. अधातु आयन की अधिकता - इस प्रकार की त्रुटि संक्रमण तत्वों से बने क्रिस्टल में होती है क्योंकि इनमें परिवर्ति ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति होती है । क्रिस्टल के निर्माण के समय जब कोई धनायन अपने नियत स्थान पर प्रवेश नहीं कर पाता है तब क्रिस्टल को विद्युत उदासीन बनाए रखने के लिए कुछ धनायन इलेक्ट्रॉन खोकर कुछ ऑक्सीकरण अवस्था में चले जाते हैं । जिससे क्रिस्टल में धनायन की संख्या कम व ऋणायन की संख्या अधिक हो जाती है अर्थात अधातु आयन की अधिकता होती है ।
जैसे - आयरन ऑक्साइड (FeO) क्रिस्टल में ।
प्रश्न - अशुद्धि दोष से आप क्या समझते हो ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अशुद्धि दोष - जब जालक में किसी वह पदार्थ अर्थात अशुद्धि की उपस्थिति होने से दोष उत्पन्न होता है तो उसे अशुद्ध दोष कहते हैं तथा इस क्रिया को डोपिंग कहते हैं । जिससे विद्युत चालकता में वृद्धि होती है और उसके गुणों विशेषतः चालकता गुणों में परिवर्तन आ जाता है ।
अशुद्धियों की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार की रासायनिक अशुद्धियां होती हैं -
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि
B. आयनों की अशुद्धि
A. उदासीन परमाणु की अशुद्धि - जब गलित अवस्था में किसी धात्विक क्रिस्टल में बाहर से अन्य तत्व के परमाणु अशुद्धि के रूप में डाले जाते हैं तब अशुद्धि के परमाणु क्रिस्टल के अंतराकाशी रिक्ति में आ जाते हैं या क्रिस्टल के मूल परमाणु को विस्थापित करके ठोस विलयन बनाते हैं ।
Ge तथा Si के के क्रिस्टल अशुद्धि दोष प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इनकी चालकता बढ़ जाती है ।
उदाहरण - जब समूह 14 के तत्वों में समूह 13 या समूह 15 के तत्व अशुद्धि के रूप में मिलाए जाते हैं तब इनकी चालकता बढ़ जाती है और यह धातु अर्द्ध चालक हो जाते हैं ।
B. आयनों की अशुद्धि - आयनिक ठोस में आयनों की अशुद्धि के मिला देने पर भी अशुद्धि दोष उत्पन्न हो जाते हैं ।
प्रश्न - डोपिंग किसे कहते हैं ।
उत्तर - डोपिंग - किसी शुद्ध पदार्थ में अशुद्धि की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर उसके गुणों में परिवर्तन करने की प्रक्रिया डोपिंग कहलाती है ।
इस प्रक्रिया द्वारा n व p - प्रकार के अर्धचालक बनाए जाते हैं और इन अर्ध चालकों का उपयोग ट्रांजिस्टर , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - F - केन्द्र किसे कहते हैं ? किसी क्रिस्टल पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर - F - केन्द्र - जब किसी कस्टल को गर्म किया जाता है तब उसमें से ऋणायन परमाणु के रूप में बाहर निकल जाता है , तब इलेक्ट्रॉन युक्त क्षेत्र बनते हैं , जिसे F - केंद्र कहते हैं ।
F - केंद्र में उपस्थित इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश से एक निश्चित ऊर्जा वाले विकिरण का अवशोषण करते हैं और शेष प्रकाश को परिवर्तित करते हैं । इस परावर्तित प्रकाश के कारण क्रिस्टल रंगीन दिखाई देता है ।
जैसे - NaCl क्रिस्टल पीला , LiCl - गुलाबी , KCl बैगनी , ZnO - पीले रंग का होता है ।
प्रश्न - अर्द्ध चालक किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - अर्धचालक -(Simeconductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता धातुओं एवं अधातुओं के मध्य होती है , अर्द्ध चालक कहलाते हैं । इनकी चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
प्रकार - अर्द्ध चालक निम्न दो प्रकार के होते है -
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप)
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप)
1. n - प्रकार अर्द्ध चालक (n टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 15 के तत्वों (P या As) को मिलाया जाता है तब n - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता ऋण आवेशित अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होती है ।
2. p - प्रकार अर्द्ध चालक (p टाइप) - जब समूह 14 के तत्वों (Si या Ge) में समूह 13 के तत्वों (B , Al या Ga) को मिलाया जाता है तब p - प्रकार के अर्धचालक बनते हैं । जिनकी चालकता धन आवेशित अतिरिक्त छिद्रों की गति के कारण होती है ।
अर्धचालकों के उपयोग - अर्धचालक को संयुक्त करके डायोड बनाए जाते हैं जिनका उपयोग रेडियो , टीवी , कंप्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में किया जाता है ।
प्रश्न - समूह 14 के तत्व को n - प्रकार के अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपांतरित करना है । यह अशुद्धि किस वर्ग से संबंधित होनी चाहिए ।
उत्तर - n - प्रकार के अर्धचालक वे होते हैं जिनकी चालकता में वृद्धि इलेक्ट्रॉनों के आधिक्य के कारण हुई है या की गई है ।
Si या Ge चौदहवें समूह के तत्व हैं और प्रत्येक में 4 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं इनके क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटतम परमाणुओं के साथ 4 सहसंयोजक बंध बनाता है ।
जब 15वें समूह के तत्व जैसे P या As , जिनमें अनेक जिनमें पांच संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं , को इसके साथ अपमिश्रित किया जाता है , तब यह Si या Ge के कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं ।
पांच में से चार इलेक्ट्रॉन Si परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध बनाने में प्रयुक्त हो जाते हैं और पांचवा अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थापित हो जाता है यह विस्थापित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित Si या Ge की चालकता में वृद्धि कर देता है । यहां चालकता वृद्धि इलेक्ट्रॉन के कारण होती है अतः इलेक्ट्रॉन धनी अशुद्धि से युक्त Si या Ge को n - प्रकार का अर्धचालक कहा जाता है ।
प्रश्न - चालकता के आधार पर ठोसों के विद्युतीय गुण लिखिए ।
अथवाचालक , कुचालक एवं अर्धचालक से आप क्या समझते हो ? उदाहरण दीजिए ।
उत्तर - चालकता के आधार पर ठोसों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है -
1. चालक या सुचालक (Conductors) - वे ठोस जो अपने में से विद्युत धारा का प्रवाह होने देते हैं , सुचालक या चालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*4 से 10*7 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - Ag , Au , Cu , Al , NaCl , CsCl आदि ।
2. अर्धचालक (Semi conductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता , सुचालक एवं कुचालक पदार्थों के मध्य होती है , अर्धचालक कहलाते हैं । इनकी चालकता का मान 10*-6 से 10*7 प्रति ओह्म प्रति मीटर होता है । और इन पदार्थों में विद्युत का संचालन अशुद्धियों की उपस्थिति के कारण होता है ।
जैसे - n टाइप व p टाइप अर्ध चालक
3. कुचालक (Insulators) - वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा का संचालन नहीं हो सकता है या बहुत कम होता है । विद्युतरोधी या कुचालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*-20 से 10*-10 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - प्लास्टिक , रबर , कांच , लकड़ी बेकेलाइट , पॉलिथीन आदि ।
प्रश्न - अतिचालकता किसे कहते हैं ?
उत्तर - अतिचालकता - अतिचालकता की खोज सर्वप्रथम सन 1913 में कैमरलिंग ओंस नामक वैज्ञानिक ने 4K ताप पर पारा में की थी ।
ऐसे पदार्थ जो विद्युत धारा के प्रवाह में बिल्कुल अवरोध नहीं करते अर्थात जिनका प्रतिरोध शून्य होता है , अतिचालक पदार्थ कहलाते हैं तथा उनके इस गुण को अतिचालकता कहते हैं ।
अनुप्रयोग -
1. सुपर मैग्नेट के निर्माण में
2. पावर ट्रांसमिशन में
3. इलेक्ट्रॉनिक्स में
प्रश्न - चालकता के आधार पर ठोसों के विद्युतीय गुण लिखिए ।
अथवा
चालक , कुचालक एवं अर्धचालक से आप क्या समझते हो ? उदाहरण दीजिए ।
उत्तर - चालकता के आधार पर ठोसों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है -
1. चालक या सुचालक (Conductors) - वे ठोस जो अपने में से विद्युत धारा का प्रवाह होने देते हैं , सुचालक या चालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*4 से 10*7 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - Ag , Au , Cu , Al , NaCl , CsCl आदि ।
2. अर्धचालक (Semi conductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता , सुचालक एवं कुचालक पदार्थों के मध्य होती है , अर्धचालक कहलाते हैं । इनकी चालकता का मान 10*-6 से 10*7 प्रति ओह्म प्रति मीटर होता है । और इन पदार्थों में विद्युत का संचालन अशुद्धियों की उपस्थिति के कारण होता है ।
जैसे - n टाइप व p टाइप अर्ध चालक
3. कुचालक (Insulators) - वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा का संचालन नहीं हो सकता है या बहुत कम होता है । विद्युतरोधी या कुचालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*-20 से 10*-10 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - प्लास्टिक , रबर , कांच , लकड़ी बेकेलाइट , पॉलिथीन आदि ।
प्रश्न - अतिचालकता किसे कहते हैं ?
उत्तर - अतिचालकता - अतिचालकता की खोज सर्वप्रथम सन 1913 में कैमरलिंग ओंस नामक वैज्ञानिक ने 4K ताप पर पारा में की थी ।
ऐसे पदार्थ जो विद्युत धारा के प्रवाह में बिल्कुल अवरोध नहीं करते अर्थात जिनका प्रतिरोध शून्य होता है , अतिचालक पदार्थ कहलाते हैं तथा उनके इस गुण को अतिचालकता कहते हैं ।
अनुप्रयोग -
1. सुपर मैग्नेट के निर्माण में
2. पावर ट्रांसमिशन में
3. इलेक्ट्रॉनिक्स में
प्रश्न - बैंड या ऊर्जा बैंड किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बैंड (Band) - जब अनेक परमाणु मिलकर किसी ठोस की रचना करते हैं तो इन परमाणुओं के बीच अन्योन्य क्रियाओं के कारण उनके ऊर्जा स्तरों में विक्षोभ अर्थात विचलन उत्पन्न हो जाता है जिसके फलस्वरूप प्रत्येक ऊर्जा स्तर अनेक स्तरों में विभक्त होकर एक बैंड का रूप ले लेता है , जिसे ऊर्जा बैंड कहते हैं ।
प्रकार - बैंड निम्न दो प्रकार के होते हैं -
1. संयोजी बैंड
2. चालन बैंड
प्रश्न - बैंड सिद्धांत के आधार पर धातुओं में विद्युत चालन व अधातुओं में विद्युत चालन और कुचालकों में अचालकता स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
कुचालक , अर्धचालक एवं सुचालक को बैंड सिद्धांत के आधार पर समझाइए ।
उत्तर - प्रश्न - बैंड या ऊर्जा बैंड किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - ऊर्जा बैंड के आधार पर ठोसों का वर्गीकरण निम्न प्रकारों में किया जा सकता है -
1. चालक 2. कुचालक 3. अर्धचालक
1. चालक - चालक दे पदार्थ होते हैं जिनमें चालक इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर्याप्त पाई जाती है तथा उनमें धारा प्रवाह सरलता से हो जाता है ।
जैसे - Ag , Al , Cu आदि ।
ऊर्जा बैंड की संरचना के अनुसार चालक भी पदार्थ होते हैं जिनके चालन बैंड इलेक्ट्रॉनों से आंशिक रूप से भरे होते हैं तथा इनके संयोजी बैंड एवं चालन बैंड या तो परस्पर अतिव्यापित होते हैं या उनके बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल लगभग नगण्य होता है ।
2. कुचालक - वे पदार्थ जिनमें चालक इलेक्ट्रॉन लगभग नगण्य संख्या में पाए जाते हैं तथा इनमें धारा का प्रवाह नहीं होता है , कुचालक कहलाते हैं ।
जैसे - लकड़ी ,कांच , प्लास्टिक आदि ।
ऊर्जा बैंड संरचना के आधार पर कुचालक वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैंड पूर्णतः भरे हुए तथा चालन बैंड पूर्णतः रिक्त होते हैं तथा इनके बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत अधिक होता है ।
3. अर्धचालक - वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों से कम तथा कुचालकों से अधिक होती है , अर्धचालक कहलाते हैं ।
जैसे - जर्मेनियम , सिलिकॉन , कार्बन आदि ।
ऊर्जा बैंड संरचना के आधार पर अर्धचालक , वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैंड पूर्ण रूप से भरे हुए होते हैं तथा चालन बैंड पूर्णतः रिक्त होते हैं परंतु चालक एवं संयोजी बैंड के बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत कम होता है ।
प्रश्न - चुंबकीय क्षेत्र के प्रति व्यवहार के आधार पर ठोस पदार्थों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है ? संक्षेप में समझाइए ।
अथवा
प्रति चुंबकीय , अनुचुंबकीय एवं लौह चुंबकीय पदार्थों को समझाइए ।
अथवा
ठोसों के चुंबकीय गुणों को समझाइए।
उत्तर - चुंबकीय क्षेत्र के प्रति व्यवहार के आधार पर ठोस पदार्थों को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
1. प्रति चुंबकीय पदार्थ (Dia-magnetic Solid)
2. अनुचुंबकीय पदार्थ (Para-magnetic Solid)
3. लौह चुंबकीय पदार्थों(Ferro-magnetic Solid)
4. प्रति लौह चुंबकीय पदार्थ(Anti-Ferro magnetic Solid)
5. फेरी चुंबकीय (Ferri - magnetic Solid)
1. प्रति चुंबकीय पदार्थ (Dia-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र के द्वारा क्षीणता से प्रतिकर्षित किए जाते हैं , प्रतिचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । ऐसे पदार्थों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं । इस प्रकार के पदार्थ द्वारा प्रति चुंबकत्व तभी दर्शाया जाता है जब वह चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है ।
जैसे - TiO2 , NaCl , बेंजीन , H2O आदि ।
2. अनुचुंबकीय पदार्थ (Para-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं , अनुचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । ऐसे पदार्थों की रचनात्मक इकाइयों में कुछ अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रहते हैं । यह पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुंबकत्व खो देते हैं ।
जैसे - O2 , VO2 , NO , CuO , TiO आदि ।
3. लौह चुंबकीय पदार्थों (Ferro-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रबलता से आकर्षित होते हैं , लौह चुंबकीय या फेरोमैग्नेटिक पदार्थ कहलाते हैं । यह पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी चुंबकत्व बनाए रखते हैं । चुंबकीय क्षेत्र में डोमेन एक दिशा में अभिविन्यासित होते हैं जो इस प्रकार की चुंबकीयता का कारण है ।
जैसे - Fe , Co , Ni , CrO2 Gd आदि ।
4. प्रति लौहचुंबकीय पदार्थ (Anti-Ferro magnetic Solid) - ऐसे पदार्थ जो अपेक्षा से बहुत कम अनुचुंबकत्व प्रदर्शित करते हैं , प्रति लौहचुंबकीय पदार्थ या एंटीफेरोमैग्नेटिक पदार्थ कहलाते हैं । इस प्रकार के पदार्थों में आयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं , परंतु इनमें इलेक्ट्रॉनों के चक्रण इस प्रकार होते हैं कि नेट चुंबकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है । इनमें डोमेन की संरचना लौह चुंबकीय ठोस के समान होती है किंतु डोमेन विपरीत अभिविन्यास होते हैं ।
जैसे - MnO , Mn2O3 , Fe2O3 , FeO , NiO आदि ।
5. फेरी चुंबकीय (Ferri - magnetic Solid) - ऐसे पदार्थ जो लौहचुंबकीय एवं प्रति लौह चुंबकीय पदार्थों के मध्य अनुचुंबकीय गुण प्रदर्शित करते हैं , फेरीमैग्नेटिक या फेरीचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । इनमें चुंबकीय गुणों का संरेखन विपरीत दिशा में किंतु असमान संख्या में होता है , जिसके कारण इनमें एक नेट चुंबकीय आघूर्ण होता है ।
जैसे - Fe3O4 , धात्विक फेराईट MFe2O4 आदि ।
अथवा
चालक , कुचालक एवं अर्धचालक से आप क्या समझते हो ? उदाहरण दीजिए ।
उत्तर - चालकता के आधार पर ठोसों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है -
1. चालक या सुचालक (Conductors) - वे ठोस जो अपने में से विद्युत धारा का प्रवाह होने देते हैं , सुचालक या चालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*4 से 10*7 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - Ag , Au , Cu , Al , NaCl , CsCl आदि ।
2. अर्धचालक (Semi conductor) - वे पदार्थ जिनकी चालकता , सुचालक एवं कुचालक पदार्थों के मध्य होती है , अर्धचालक कहलाते हैं । इनकी चालकता का मान 10*-6 से 10*7 प्रति ओह्म प्रति मीटर होता है । और इन पदार्थों में विद्युत का संचालन अशुद्धियों की उपस्थिति के कारण होता है ।
जैसे - n टाइप व p टाइप अर्ध चालक
3. कुचालक (Insulators) - वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा का संचालन नहीं हो सकता है या बहुत कम होता है । विद्युतरोधी या कुचालक पदार्थ कहलाते हैं । इनकी चालकता 10*-20 से 10*-10 प्रति ओम प्रति मीटर होती है ।
जैसे - प्लास्टिक , रबर , कांच , लकड़ी बेकेलाइट , पॉलिथीन आदि ।
प्रश्न - अतिचालकता किसे कहते हैं ?
उत्तर - अतिचालकता - अतिचालकता की खोज सर्वप्रथम सन 1913 में कैमरलिंग ओंस नामक वैज्ञानिक ने 4K ताप पर पारा में की थी ।
ऐसे पदार्थ जो विद्युत धारा के प्रवाह में बिल्कुल अवरोध नहीं करते अर्थात जिनका प्रतिरोध शून्य होता है , अतिचालक पदार्थ कहलाते हैं तथा उनके इस गुण को अतिचालकता कहते हैं ।
अनुप्रयोग -
1. सुपर मैग्नेट के निर्माण में
2. पावर ट्रांसमिशन में
3. इलेक्ट्रॉनिक्स में
प्रश्न - बैंड या ऊर्जा बैंड किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - बैंड (Band) - जब अनेक परमाणु मिलकर किसी ठोस की रचना करते हैं तो इन परमाणुओं के बीच अन्योन्य क्रियाओं के कारण उनके ऊर्जा स्तरों में विक्षोभ अर्थात विचलन उत्पन्न हो जाता है जिसके फलस्वरूप प्रत्येक ऊर्जा स्तर अनेक स्तरों में विभक्त होकर एक बैंड का रूप ले लेता है , जिसे ऊर्जा बैंड कहते हैं ।
प्रकार - बैंड निम्न दो प्रकार के होते हैं -
1. संयोजी बैंड
2. चालन बैंड
प्रश्न - बैंड सिद्धांत के आधार पर धातुओं में विद्युत चालन व अधातुओं में विद्युत चालन और कुचालकों में अचालकता स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
कुचालक , अर्धचालक एवं सुचालक को बैंड सिद्धांत के आधार पर समझाइए ।
उत्तर - प्रश्न - बैंड या ऊर्जा बैंड किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर - ऊर्जा बैंड के आधार पर ठोसों का वर्गीकरण निम्न प्रकारों में किया जा सकता है -
1. चालक 2. कुचालक 3. अर्धचालक
1. चालक - चालक दे पदार्थ होते हैं जिनमें चालक इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर्याप्त पाई जाती है तथा उनमें धारा प्रवाह सरलता से हो जाता है ।
जैसे - Ag , Al , Cu आदि ।
ऊर्जा बैंड की संरचना के अनुसार चालक भी पदार्थ होते हैं जिनके चालन बैंड इलेक्ट्रॉनों से आंशिक रूप से भरे होते हैं तथा इनके संयोजी बैंड एवं चालन बैंड या तो परस्पर अतिव्यापित होते हैं या उनके बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल लगभग नगण्य होता है ।
2. कुचालक - वे पदार्थ जिनमें चालक इलेक्ट्रॉन लगभग नगण्य संख्या में पाए जाते हैं तथा इनमें धारा का प्रवाह नहीं होता है , कुचालक कहलाते हैं ।
जैसे - लकड़ी ,कांच , प्लास्टिक आदि ।
ऊर्जा बैंड संरचना के आधार पर कुचालक वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैंड पूर्णतः भरे हुए तथा चालन बैंड पूर्णतः रिक्त होते हैं तथा इनके बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत अधिक होता है ।
3. अर्धचालक - वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों से कम तथा कुचालकों से अधिक होती है , अर्धचालक कहलाते हैं ।
जैसे - जर्मेनियम , सिलिकॉन , कार्बन आदि ।
ऊर्जा बैंड संरचना के आधार पर अर्धचालक , वे पदार्थ होते हैं जिनके संयोजी बैंड पूर्ण रूप से भरे हुए होते हैं तथा चालन बैंड पूर्णतः रिक्त होते हैं परंतु चालक एवं संयोजी बैंड के बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत कम होता है ।
प्रश्न - चुंबकीय क्षेत्र के प्रति व्यवहार के आधार पर ठोस पदार्थों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है ? संक्षेप में समझाइए ।
अथवा
प्रति चुंबकीय , अनुचुंबकीय एवं लौह चुंबकीय पदार्थों को समझाइए ।
अथवा
ठोसों के चुंबकीय गुणों को समझाइए।
उत्तर - चुंबकीय क्षेत्र के प्रति व्यवहार के आधार पर ठोस पदार्थों को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
1. प्रति चुंबकीय पदार्थ (Dia-magnetic Solid)
2. अनुचुंबकीय पदार्थ (Para-magnetic Solid)
3. लौह चुंबकीय पदार्थों(Ferro-magnetic Solid)
4. प्रति लौह चुंबकीय पदार्थ(Anti-Ferro magnetic Solid)
5. फेरी चुंबकीय (Ferri - magnetic Solid)
1. प्रति चुंबकीय पदार्थ (Dia-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र के द्वारा क्षीणता से प्रतिकर्षित किए जाते हैं , प्रतिचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । ऐसे पदार्थों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं । इस प्रकार के पदार्थ द्वारा प्रति चुंबकत्व तभी दर्शाया जाता है जब वह चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है ।
जैसे - TiO2 , NaCl , बेंजीन , H2O आदि ।
2. अनुचुंबकीय पदार्थ (Para-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं , अनुचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । ऐसे पदार्थों की रचनात्मक इकाइयों में कुछ अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रहते हैं । यह पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुंबकत्व खो देते हैं ।
जैसे - O2 , VO2 , NO , CuO , TiO आदि ।
3. लौह चुंबकीय पदार्थों (Ferro-magnetic Solid) - वे पदार्थ जो चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रबलता से आकर्षित होते हैं , लौह चुंबकीय या फेरोमैग्नेटिक पदार्थ कहलाते हैं । यह पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी चुंबकत्व बनाए रखते हैं । चुंबकीय क्षेत्र में डोमेन एक दिशा में अभिविन्यासित होते हैं जो इस प्रकार की चुंबकीयता का कारण है ।
जैसे - Fe , Co , Ni , CrO2 Gd आदि ।
4. प्रति लौहचुंबकीय पदार्थ (Anti-Ferro magnetic Solid) - ऐसे पदार्थ जो अपेक्षा से बहुत कम अनुचुंबकत्व प्रदर्शित करते हैं , प्रति लौहचुंबकीय पदार्थ या एंटीफेरोमैग्नेटिक पदार्थ कहलाते हैं । इस प्रकार के पदार्थों में आयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं , परंतु इनमें इलेक्ट्रॉनों के चक्रण इस प्रकार होते हैं कि नेट चुंबकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है । इनमें डोमेन की संरचना लौह चुंबकीय ठोस के समान होती है किंतु डोमेन विपरीत अभिविन्यास होते हैं ।
जैसे - MnO , Mn2O3 , Fe2O3 , FeO , NiO आदि ।
5. फेरी चुंबकीय (Ferri - magnetic Solid) - ऐसे पदार्थ जो लौहचुंबकीय एवं प्रति लौह चुंबकीय पदार्थों के मध्य अनुचुंबकीय गुण प्रदर्शित करते हैं , फेरीमैग्नेटिक या फेरीचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं । इनमें चुंबकीय गुणों का संरेखन विपरीत दिशा में किंतु असमान संख्या में होता है , जिसके कारण इनमें एक नेट चुंबकीय आघूर्ण होता है ।
जैसे - Fe3O4 , धात्विक फेराईट MFe2O4 आदि ।
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